डॉ. नरेन्द्र कोहली के विषय में


जन्म : 6 जनवरी 1940 . को स्यालकोट (अविभाजित पंजाब) में जन्म हुआ। यह नगर अब पाकिस्तान में है।

माता : माता विद्यावंती का जन्म एक छोटे गांव के साधारण कृषक परिवार में (वर्ष अज्ञात) हुआ था। लड़कियों की शिक्षा की व्यवस्था एवं परंपरा न होने के कारण वे निरक्षर ही रहीं। 1992 . में दिल्ली में अनुमानत: अस्सी - बयासी वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हुआ।

पिता : पिता, परमानन्द कोहली, स्यालकोट के मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा परिवार में 1903 . में जन्मे थे। आंखों के रोग के कारण आठवीं कक्षा में ही स्कूल से उठा लिए गए। पढ़ने और लिखने का शौक होते हुए भी, आगे पढ़ नहीं सके। उर्दू में लिखे अपने तीन चार उपन्यासों की पांडुलिपियां अपने लेखक पुत्र के लिए उत्‍तराधिकार स्वरूप छोड़ गए। अविभाजित पंजाब के वन विभाग में अस्थाई क्लर्क के पद पर काम करते रहे। देश के विभाजन के पश्चात् पूंजी, डिग्री तथा अन्य किसी कौशल के अभाव के कारण जमशेदपुर में पटरी पर बैठ कर फल बेचने को बाध्य हुए। बाद में एक छोटी सी दुकान की। 1985 . में बयासी वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हुआ।

शिक्षा : शिक्षा का आरंभ पांच-छह वर्ष की अवस्था में देवसमाज हाई स्कूल, लाहौर में हुआ। उसके पश्चात् कुछ महीने स्यालकोट के गंडासिंह हाई स्कूल में भी शिक्षा पाई। 1947 . में देश के विभाजन के पश्चात् परिवार जमशेदपुर (तब बिहार, अब झारखंड) चला आया। यहां तीसरी कक्षा से पढ़ाई आरंभ हुई, धतकिडीह लोअर प्राइमरी स्कूल में। चौथी से सातवीं कक्षा (1949- 53 .) तक की शिक्षा, न्यू मिडिल इंग्लिश स्कूल में हुई। आठवीं से ग्यारहवीं कक्षा (1953-57 .) की पढ़ाई मिसिज़ के. एम. पी. एम. हाई स्कूल, जमशेदपुर में हुई। हाई स्कूल में विज्ञान संबंधी विषयों का अध्ययन किया। अब तक की सारी शिक्षा का माध्यम उर्दू भाषा ही थी।

उच्च शिक्षा के लिए जमशेदपुर को- ऑपरेटिव कॉलेज में प्रवेश किया। विषय थे, अनिवार्य अंग्रेजी तथा अनिवार्य हिंदी के साथ मनोविज्ञान,तर्कशास्त्र और विशिष्ट हिंदी। आई.. (1959 .) की परीक्षा बिहार विश्वविद्यालय से दी। बी. . में अनिवार्य अंग्रेजी के साथ दर्शनशास्त्र और हिंदी साहित्य (ऑनर्स) का चुनाव किया। 1961 . में जमशेदपुर को- ऑपरेटिव कॉलेज (रांची विश्वविद्यालय) से बी. . ऑनर्स (हिंदी) कर एम. . की शिक्षा के लिए दिल्ली चले आए। 1963 . में रामजस कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) से हिंदी साहित्य में एम.. की परीक्षा उत्‍तीर्ण की। इसी विश्वविद्यालय से 1970 . में पी-एच.डी.(विद्या वाचस्पति) की उपाधि प्राप्त की।

आजीविका : पहली नौकरी दिल्ली के पी.जी.डी..वी.(सांध्य) कॉलेज में हिंदी के अध्यापक (1963-65.) के रूप में की। दूसरी नौकरी दिल्ली के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में 1965 . में आरंभ की और 1 नवंबर 1995 . को पचपन वर्ष की अवस्था में स्वैच्छिक अवकाश लेकर नौकरियों का सिलसिला समाप्त कर दिया।

परिवार : 1965 . में विवाह हुआ,या विवाह किया। पत्नी, डॉ. मधुरिमा कोहली,दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम. .; पी-एच.डी. हैं। वे दिल्ली के कमला नेहरू कॉलेज के हिंदी विभाग से 1964 . से संबद्ध हैं और अब रीडर के पद पर कार्यरत हैं। पहली पुत्री संचिता केवल चार महीने ही जीवित रही। दिसंबर 1967 . में जुड़वां संतानों - कार्त्तिकेय और सुरभि - का जन्म हुआ। सुरभि केवल चौबीस दिनों की आयु लेकर आई थी। कार्त्तिकेय अब दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम..; एम.फिल्; पी-एच.डी. कर रामलाल आनंद (सांध्य) कॉलेज, दिल्ली में अर्थशास्त्र पढ़ा रहे हैं। पुत्रवधू वंदना चक्षुविशेषज्ञ हैं। छोटे पुत्र अगस्त्य का जन्म 1975 .में हुआ। वे दिल्ली के सरदार पटेल विद्यालय से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा प्राप्त कर इलिनॉय इंस्टिट्यूट ऑफ टैक्नॉलॉजी, शिकागो में यांत्रिकी की शिक्षा के लिए चले गए। अब सियैटल (संयुक्त राज्य अमरीका) में टेलिकंयूनिकेशन सिस्‍टम्‍स में नेटवर्क अभियंता के रूप में कार्यरत हैं।





लेखन

प्रथम रचना : लिखने और छपने की इच्छा बचपन से ही थी। छठी में कक्षा की हस्तलिखित पत्रिका में पहली रचना प्रकाशित हुई। आठवीं कक्षा में स्कूल की मुद्रित पत्रिका में एक कहानी 'हिंदोस्तां : जन्नत निशां' उर्दू में प्रकाशित हुई। हाई स्कूल के ही दिनों में हिंदी में लिखना आरंभ हुआ। 'किशोर' (पटना), 'आवाज़' (धनबाद) इत्यादि में कुछ आरंभिक रचनाएं, बाल लेखक के रूप में प्रकाशित हुईं। आई..की पढ़ाई के दिनों में एक कहानी 'पानी का जग,गिलास और केतली', 'सरिता' (दिल्ली) के 'नए अंकुर' स्तंभ में प्रकाशित हुई थी। नियमित प्रकाशन का आरंभ फरवरी 1960 . से आरंभ हुआ। इसलिए अपनी प्रथम प्रकाशित रचना 'दो हाथ' (कहानी,इलाहाबाद, फरवरी 1960 .) को मानते हैं।

साहित्य

नरेन्द्र कोहली उपन्यासकार हैं,कहानीकार हैं,नाटककार हैं तथा व्यंग्यकार हैं। ये सब होते हुए भी,वे अपने समकालीन साहित्यकारों से पर्याप्त भिन्न हैं। साहित्य की समृद्धि तथा समाज की प्रगति में उनका योगदान प्रत्यक्ष है। उन्होंने प्रख्यात् कथाएं लिखी हैं; किंतु वे सर्वथा मौलिक हैं। वे आधुनिक हैं; किंतु पश्चिम का अनुकरण नहीं करते। भारतीयता की जड़ों तक पहुंचते हैं,किंतु पुरातनपंथी नहीं हैं।


1960 . में नरेन्द्र कोहली की कहानियां प्रकाशित होनी आरंभ हुई थीं,जिनमें वे साधारण पारिवारिक चित्रों और घटनाओं के माध्यम से समाज की विडंबनाओं को रेखांकित कर रहे थे। 1965 .के आस-पास वे व्यंग्य लिखने लगे थे। उनकी भाषा वक्र हो गई थी,और देश तथा राजनीति की विडंबनाएं सामने आने लगी थीं। उन दिनों लिखी गई अपनी रचनाओं में उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन की अमानवीयता,क्रूरता तथा तर्कशून्यता के दर्शन कराए। हिंदी का सारा व्यंग्य साहित्य इस बात का साक्षी है कि अपनी पीढ़ी में उनकी सी प्रयोगशीलता, विविधता तथा प्रखरता कहीं और नहीं है।

उन्होंने पारिवारिक और सामाजिक उपन्यासों की भी रचना की; किंतु केवल सामाजिक चित्रण तथा विडंबनाओं और विकृतियों की भर्त्सना मात्र से उन्हें संतोष नहीं हुआ। वे कुछ बहुत सार्थक करना चाहते थे। उन्होंने अनुभव किया कि जीवन के संकीर्ण,संक्षिप्त तथा सीमित चित्रण से साहित्य अपनी परिपूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता; न समाज ही उससे अधिक लाभान्वित हो सकता है। हीन वृत्तियों के चित्रण से हीनता तथा हीन भावनाओं की वृद्धि होगी। अत: साहित्य का लक्ष्य है,जीवन के उदात्‍त,महान् तथा सात्विक पक्ष का चित्रण करना।

नरेन्द्र कोहली ने रामकथा से सामग्री लेकर चार खंडों में 1800 पृष्ठों का एक बृहदाकार उपन्यास लिखा। कदाचित् संपूर्ण रामकथा को लेकर,किसी भी भाषा में लिखा गया,यह प्रथम उपन्यास है। उपन्यास है,इसलिए समकालीन,प्रगतिशील,आधुनिक तथा तर्काश्रित है। इसकी आधारभूत सामग्री भारत की सांस्कृतिक परंपरा से ली गई है,इसलिए इसमें जीवन के उदात्‍त मूल्यों का चित्रण है,मनुष्य की महानता तथा जीवन की अबाधता का प्रतिपादन है। हिंदी का पाठक जैसे चौंक कर,किसी गहरी नीन्द से जाग उठा। वह अपने संस्कारों और बौद्धिकता के द्वंद्व से मुक्त हुआ। उसे अपने उद्दंड प्रश्नों के उत्‍तर मिले,शंकाओं का समाधान हुआ। इस कृति का अभूतपूर्व स्वागत हुआ;और हिंदी उपन्यास की धारा की दिशा ही बदल गई।

नरेन्द्र कोहली ने एक उपन्यास - 'अभिज्ञान' - कृष्णकथा को लेकर लिखा। कथा राजनीतिक है। निर्धन और अकिंचन सुदामा को सामर्थ्यवान श्रीकृष्ण,सार्वजनिक रूप से अपना मित्र स्वीकार करते हैं,तो सामाजिक,व्यावसायिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सुदामा की साख तत्काल बढ़ जाती है। ... किंतु इस कृति का मेरुदंड भगवद्गीता का 'कर्म सिद्धांत' है। इस कृति में न परलोक है,न स्वर्ग और नरक, न जन्मांतरवाद। 'कर्म सिद्धांत' को इसी पृथ्वी पर एक ही जीवन के अंतर्गत, ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि के आधार पर, वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुरूप व्याख्यायित किया गया है। वह भी एक सरस उपन्यास के एक रोचक खंड के रूप में। यह अद्भुत है,अभूतपूर्व है। आप इस तर्कशैली की किसी भी रूप में अवहेलना नहीं कर सकते।

तब नरेन्द्र कोहली ने महाभारत-कथा के आधार पर,अपने नए उपन्यास 'महासमर' की रचना आरंभ की। 'महाभारत' एक विराट कृति है,जो भारतीय जीवन,चिंतन, दर्शन तथा व्यवहार को मूर्तिमंत रूप में प्रस्तुत करती है। नरेन्द्र कोहली ने इस कृति को अपने युग में पूर्णत: जीवंत कर दिया है। उन्होंने अपने इस उपन्यास में जीवन को उसकी संपूर्ण विराटता के साथ अत्यंत मौलिक ढंग से प्रस्तुत किया है। जीवन के वास्तविक रूप से संबंधित प्रश्नों का समाधान वे अनुभूति और तर्क के आधार पर देते हैं। इस कृति में आप महाभारत पढ़ने बैठेंगे और अपना जीवन पढ़ कर उठेंगे। युधिष्ठिर,कृष्ण,कुंती,द्रौपदी,बलराम,अर्जुन,भीम तथा कर्ण आदि चरित्रों को अत्यंत नवीन रूप में देखेंगे। नरेन्द्र कोहली की मान्यता है कि वही उन चरित्रों का महाभारत में चित्रित वास्तविक स्वरूप है।

नरेन्द्र कोहली ने एक ओर उपन्यास श़ृंखला आरंभ कर पाठकों को चकित कर दिया। यह है, 'तोड़ो कारा तोड़ो'। यह शीर्षक रवीन्द्रनाथ ठाकुर के एक गीत की एक पंक्ति का अनुवाद है; किंतु उपन्यास का संबंध स्वामी विवेकानन्द की जीवनकथा से है। यह कार्य सब से कठिन था। स्वामी जी का जीवन निकट अतीत की घटना है। उनके जीवन की सारी घटनाएं सप्रमाण इतिहासांकित हैं। इसमें उपन्यासकार की अपनी कल्पना अथवा चिंतन के लिए कोई विशेष अवकाश नहीं है। अपने नायक के व्यक्तित्व और चिंतन से तादात्म्य ही उनके लिए एक मात्र मार्ग है। ...और फिर स्वामी जी की प्रामाणिक जीवनियों के पश्चात् उपन्यास की आवश्यकता ही क्या थी? शायद उपन्यास की आवश्यकता उन लोगों के लिए थी, जो स्वामी जी से प्रेम तो करते थे; किंतु उनकी जीवनियों अथवा वैचारिक निबंधों को पढ़ने, समझने और धारण करने की क्षमता नहीं रखते,अथवा उसमें रुचि नहीं रखते। नरेन्द्र कोहली के इस सरस उपन्यास के प्रत्येक पृष्ठ पर,उपन्यासकार के अपने नायक के साथ तादात्म्य को देख कर पाठक चकित रह जाता है। स्वामी विवेकानन्द का जीवन बंधनों तथा सीमाओं के अतिक्रमण के लिए सार्थक संघर्ष था: बंधन चाहे प्रकृति के हों,समाज के हों,राजनीति के हों,धर्म के हों,अध्यात्म के हों। नरेन्द्र कोहली के शब्दों में, ''स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व का आकर्षण ... आकर्षण नहीं,जादू ... जादू जो सिर चढ़ कर बोलता है। कोई संवेदनशील व्यक्ति उनके निकट जाकर, सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता। ... और युवा मन तो उत्साह से पागल ही हो जाता है। कौन सा गुण था, जो स्वामी जी में नहीं था। मानव के चरम विकास की साक्षात् मूर्ति थे वे। भारत की आत्मा... और वे एकाकार हो गए थे। उन्हें किसी एक युग,प्रदेश,संप्रदाय अथवा संगठन के साथ बांध देना,अज्ञान भी है और अन्याय भी।'' ऐसे स्वामी विवेकानन्द के साथ तादात्म्य किया है नरेन्द्र कोहली ने। उनका यह उपन्यास ऐसा ही तादात्म्य करा देता है,पाठक का उस विभूति से।







प्रकाशित रचनाएं

1.प्रेमचंद के साहित्य सिद्धांत (शोध-निबंध) 1966 .

प्रकाशक : अशोक प्रकाशन,नई सड़क, दिल्ली-110006

अपने छात्र जीवन में,एम.. के पाठ्यक्रम के आठवें प्रश्नपत्र के अंतर्गत लिखा गया लघु शोध-निबंध। भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद के रचना-संसार का प्रथम बार सैद्धांतिक विवेचन। सर्जक साहित्यकार के मन तथा चिंतन संबंधी अनेक मौलिक स्थापनाएं। प्रेमचंद के साहित्य को समझने की एक नई दृष्टि। अब यह ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। इसकी सामग्री प्रेमचंद(वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली)-1991 . में समाहित कर दी गई है।

2. कुछ प्रसिद्ध कहानियों के विषय में (समीक्षा)- 1967 .

प्रकाशक : उमेश प्रकाशन, दिल्ली - 110006

पाठ्यक्रम में प्राय: निर्धारित रहने वाली, हिंदी की कुछ प्रसिद्ध कहानियों की मौलिक तथा सर्जनात्मक आलोचना। अब यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है।

3.परिणति - (कहानियां)-1969/2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी,दिल्ली - 110009

लेखक के आरंभिक दस वर्षों की रचनाओं में से चुनी गई कहानियों का पहला संग्रह। जीवन के झूठ और रोमांस को तीखी कलम से छील छील कर, यथार्थ जीवन को उकेरने वाली कहानियां।

इसका पहला संस्करण नेशनल पब्लिशिंग हाउससे 1969 . में प्रकाशित हुआ था। वह संस्करण दो ही वर्षों में समाप्त हो गया। वर्षों अनुपलब्ध रहने के पश्चात् अब सन् 2000 . में इस पुस्तक का अजिल्द (पेपरबैक) संस्करण क्रियेटिव बुक कंपनी से प्रकाशित हुआ है।

पृष्ठ : 132, मूल्य : पचास रुपए मात्र।

4.एक और लाल तिकोन- (व्यंग्य)-1970/ 2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी,दिल्ली - 110009

हास्य -व्यंग्य रचनाओं का पहला संकलन,जिसमें कथा-तत्व भी पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। बहुत सारी रचनाएं तो व्यंग्य कथाएं ही बन गई हैं। चढ़ती उम्र में लिखी गई इन प्रखर रचनाओं में से अनेक रचनाएं आज हिंदी व्यंग्य साहित्य के श्रेणी साहित्य में परिगणित होती हैं।

इसका पहला संस्करण नेशनल पब्लिशिंग हाउससे 1970 . में प्रकाशित हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रह कर अब सन् 2000 . में इसका प्रकाशन क्रियेटिव बुक कंपनी से अजिल्द (पेपरबैक) संस्करण के रूप में हुआ है।

पृष्ठ : 137 मूल्‍य :

5. पुनरारंभ - (उपन्यास)- 1972 /1994 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण के पंजाब के जनजीवन का चित्रण। उस पुरुष प्रधान समाज में भी तेजस्विनी और चरित्रवती नायिका अपने पति से बार बार प्रताड़ित होकर, उन कठोर परिस्थितियों में भी अपने संकल्प के आधार पर अपनी संतान के पालन-पोषण के सहारे, अपने जीवन का पुनरारंभ करती है।

यह उपन्यास नरेन्द्र कोहली का पहला उपन्यास है। इसकी कथा उनके पिता के जीवनानुभवों पर आधृत है। लेखक ने स्वीकार किया है कि उन्होंने इस उपन्यास में अपने पिता द्वारा प्रस्तुत कच्ची सामग्री के कुछ अंशों को ही विकसित किया है।

इस उपन्यास का पहला संस्करण 1972 . में नेशनल पब्लिशिंग हाउससे हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रहा। 1994 . में इसका नया संस्करण वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया है।

पृष्ठ : 214, मूल्य : पचहत्‍तर रुपए मात्र।

6. आतंक (उपन्यास)- 1972 .

प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली- 110006

तीन परिवारों की कथा के माध्यम से परिवेश में फैले व्यापक आतंक का निर्भीक चित्रण। लेखक की मान्यता है कि इस सारे आतंक के मूल में भ्रष्ट राजनीति तथा दुश्चरित्र सत्‍ताकर्मी ही हैं। पैंतीस वर्ष पूर्व भारत के राजनीतिक और सामाजिक सत्य प्रस्तुत करने वाला सशक्त और साहसपूर्ण उपन्यास।

1972 से 1978 . तक इस उपन्यास का सजिल्द संस्करण उपलब्ध था। 1998 . में यह अजिल्द संस्करण में उपलब्ध हो गया है।

पृष्ठ : 180, मूल्य : पचास रुपए मात्र।

7. पांच एब्सर्ड उपन्यास (व्यंग्य) - 1972 /1994 .

प्रकाशक : भारतीय प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली - 110002

जब एक उपन्यासकार की कलम, कार्टूनिस्ट की दृष्टि पा जाती है, तो एब्सर्ड उपन्यासों की रचना होती है। नरेन्द्र कोहली की इन पांच रचनाओं में आपको उपन्यास का गठन, व्यंग्यचित्रकार की पैनी दृष्टि, एक अनोखा अप्रस्तुत विधान, तीखा करारा व्यंग्य तथा समकालीन जीवन की कुतर्कशीलता अपनी समग्रता में उपलब्ध होगी। सर्वथा नवीन कथ्य, शिल्प, शैली और विधा। व्यंग्य लेखन का एक सर्वथा नवीन आयाम। इन रचनाओं में आपको व्यंग्य अपनी संपूर्ण गंभीरता में मिलेगा और आप समझ पाएंगे कि व्यंग्य हंसाने के साथ रुला भी सकता है, घावों को कुरेद भी सकता है ; और व्यक्ति को उसके आक्रोश का जीवन्त साक्षात्कार भी करा सकता है।

इसका पहला संस्करण 1972 . में नेशनल पब्लिशिंग हाउससे प्रकाशित हुआ था। दो एक संस्करण और भी हुए, क्योंकि यह कृति हिमाचल विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम में निर्धारित हो गई थी। प्राय: बीस वर्ष तक अनुपलब्ध रहने के पश्चात् 1994 . में भारतीय प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली से इसका पुनर्प्रकाशन हुआ। अब यह डायमंड बुक्स में भी उपलब्ध है।

पृष्ठ : 107, मूल्य : पचास रुपए मात्र।

8.आश्रितों का विद्रोह (व्यंग्य)- 1973 / 1991 .

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली 110002

आश्रितों का विद्रोह आजकी भ्रष्ट राजनीति, समस्याओं से भरे असुविधापूर्ण जीवन तथा निष्क्रिय सहिष्णु जनता की मृत मन:स्थिति के प्रति एक सर्जनात्मक विरोध है। भ्रम की अंतिम परत तक को चीर देने वाले इस उपन्यास में नए शिल्प, फंतासी-प्राय विधा और सूक्ष्म व्यंग्य के बीच भी सामान्य जनजीवन अपनी संपूर्ण समस्याओं के साथ यथार्थ रूप में विद्यमान है।

इस उपन्यास में नरेन्द्र कोहली ने कथा कहने की एक अद्भुत व्यंग्य-प्रधान शैली, तीखी, चुभती हुई पारदर्शी भाषा के साथ अन्याय के विरुद्ध शस्त्र के रूप में निर्मित एक नए जीवन दर्शन को समझने समझाने का सार्थक प्रयास किया है।

महानगर दिल्ली के सामान्य जन की अपनी आवश्यकताओं - राशन, दूध, यातायात इत्यादि - के लिए जूझने की एक फंतासीय कथा। सरकार पर आश्रित जन-सामान्य सरकारी व्यवस्था के बहिष्कार द्वारा अपना विद्रोह जताता है;किंतु राजनीति उसे पुन: शासनतंत्र पर आश्रित बना देती है। एक अनोखा व्यंग्य उपन्यास, जो एक प्रकार से समाज के विषय में कुछ भविष्यवाणियां ही नहीं कर रहा, सत्‍ताशाहों की निरंकुशता और प्रजा की असहायता की ओर भी संकेत करता है। साथ ही साथ यह चेतावनी भी देता है कि जो लोग अपने आलस्य और स्वार्थ में अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते, वे आत्मविनाश का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। संसार में केवल वही टिक पाता है, जो किसी न किसी प्रकार से समाज के लिए उपयोगी है।

पृष्ठ : 169, मूल्य : तीस रुपए मात्र।

9. जगाने का अपराध (व्यंग्य)- 1973 .

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली - 110002

'' ... गोडसे को फांसी इसलिए हुई क्योंकि उसने महात्मा गांधी को समाधि से जगाने का प्रयत्न किया था। कैनेडी भाइयों को गोली इसलिए मारी गई, क्योंकि वे अपने देश को जगा रहे थे। प्रत्येक आंदोलन में नेताओं को दंड मिलता है, क्योंकि वे किसी न किसी को जगाने का प्रयत्न करते हैं। चीन को हम अपना शत्रु मानते हैं क्योंकि उसने हमें जगाने का प्रयत्न किया। पाकिस्तान हमारा शत्रु है, क्योंकि वह हमें सोने नहीं देता। बड़े बड़े देश हमारे मित्र हैं, क्योंकि उन्होंने सदा ही इस देश की जागृति का विरोध किया है। वे चाहते हैं कि यह देश सोता रहे ...'' और नरेन्द्र कोहली का यह संकल्प है कि वे जगाने का यह अपराध बार बार करेंगे ; क्योंकि उनका यह व्यंग्य लेखन न तो खाली मन की चुहल है, न पाठकों के मनोरंजन का प्रयत्न। सार्थक व्यंग्य की ये तीस रचनाएं निश्चित् रूप से पाठकों को विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई सड़ांध के प्रति जागरूक बनाने का ईमानदार प्रयत्न हैं।

पृष्ठ : 165, मूल्य : साढ़े पांच रुपए मात्र।

10. साथ सहा गया दुख (उपन्यास)- 1974 .

प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली - 110006

कामकाजी नवदंपती के महानगरीय जीवन का चित्रण। सामाजिक और आर्थिक संघर्षों के मध्य से गुजरती कथा के माध्यम से लेखक पति-पत्नी संबंधों को संघर्ष से उतार कर तादात्म्य के धरातल पर लाता है। विवाह-विच्छेद की वकालत के इस युग में, लेखक यह स्थापित करता है कि 'एक साथ सहा गया दुख' उस दंपती के जीवन भर के तादात्म्य का आधार बन जाता है। साधारण दांपत्य जीवन का एक मर्मस्पर्शी उपन्यास।

1998 . से केवल अजिल्द संस्करण में उपलब्ध।

पृष्ठ : 135, मूल्य : पचास रुपए मात्र।

11. मेरा अपना संसार (लघु उपन्यास) - 1975 .

प्रकाशक : पराग प्रकाशन, दिल्ली - 110032 .

दो लघु उपन्यासों का संकलन। व्यक्तिगत और सामाजिक आर्थिक असफलताओं के बीच जीने वाले दो नारी पात्रों की मार्मिक कहानियां, जिनमें से एक क्रमश: भावात्मक आत्महत्या की ओर बढ़ रही है और दूसरी अपराध की ओर।

यह पुस्तक वर्षों से अनुपलब्ध है।

12. शंबूक की हत्या (नाटक)- 1975 .

प्रकाशक : विवेक प्रकाशन, दिल्ली - 110032 .

'अभ्युदय' के लेखन को बीच में ही रोक कर लेखक ने यह नाटक लिखा। लिखा तो यह भी आरंभ में एक उपन्यास के रूप में ही गया था; किंतु इसकी सामग्री नाटक के अनुरूप होने के कारण इसे नाटक का रूप दिया गया। नरेन्द्र कोहली द्वारा संपादित पत्रिका अतिमर्श के फरवरी- अप्रैल 1974 . के अंक में यह पहली बार प्रकाशित हुआ। वह समय श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपात् स्थिति लागू करने का था। अत: प्रकाशक ने नाटक में कुछ परिवर्तन तो किए, किंतु नाटक प्रकाशित हो गया।

'शंबूक की हत्या' पौराणिक नाटक नहीं है। इसमें पौराणिक संदर्भ का सहारा मात्र लिया गया है। रामायण के उस ब्राह्मण ने तत्कालीन शासक से पूछा था, ''मेरे पुत्र की अकाल मृत्यु के लिए उत्‍तरदायी कौन है?'' और स्वयं ही उत्‍तर दिया था, ''राजा की असत्वृत्तियों से ही प्रजा की अकाल मृत्यु होती है।''

अपने इस नाटक में नरेन्द्र कोहली पूरे देश की ओर से पूछ रहे हैं,'करोड़ों की संख्या में भारत की जनता की शारीरिक, आर्थिक और नैतिक अकाल मृत्यु के लिए दोषी कौन है?' और नाटक अपने आप ही पुकार पुकार कर कहता है,'शासन का पाप ही जनता की अकाल मृत्यु के लिए दोषी है।'

हिंदी का अद्वितीय व्यंग्य नाटक,जिसका कथ्य ही नहीं,शिल्प भी,व्यंग्य की अपूर्व ऊंचाइयों को छूता है।

पहली बार इसका मंचन चंद्रमोहन के निर्देशन में लिट्ल थियेटर ग्रुप,नई दिल्ली में जनवरी 1978 . में हुआ।

पृष्ठ : 84, मूल्य : बीस रुपए मात्र।

13. दीक्षा (उपन्यास) - 1975 .

प्रकाशक : अभिरुचि प्रकाशन, दिल्ली - 110032

तीस वर्ष पूर्व प्रकाशित यह उपन्यास (अथवा यह उपन्यास शृंखला) आज अपनी उत्कृष्टता तथा लोकप्रियता को प्रत्येक मानदंड पर प्रमाणित कर चुकी है। उसके अनेक सजिल्द, अजिल्द और पॉकेटबुक संस्करण प्रकशित हो चुके हैं। समाचारपत्रों तथा प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में खंड रूप से अथवा धारावाहिक रूप में प्रकाशित होकर लोकप्रियता का प्रतिमान बन चुकी है। विभिन्न भारतीय भाषाओं तथा अंग्रेजी में उसका अनुवाद हो चुका है। उसपर दर्जनों शोधकर्ताओं ने शोध कर विभिन्न विश्वविद्यालयों से उपाधियां प्राप्त की हैं। पुरस्कारों के विषय में तो कहना ही क्या। इसकी लोकप्रियता किसी भी लेखक के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकती है।

रामकथा संबंधित अपने उपन्यास - अभ्युदय - की रचना-प्रक्रिया के विषय में स्वयं लेखक ने लिखा है, ''शायद तभी यह बात मेरे मन में आई थी कि इस पूरी कृति को एक जिल्द में न रखकर, कुछ खंडों में बांट कर लिखा जाए,ताकि जो भी खंड पूरा हो, वह अपने आप में संपूर्ण और स्वतंत्र रचना हो। यदि दूसरा खंड किन्हीं कारणों से न भी लिखा जा सके, तो मेरी कृति अधूरी न रहे। कोई व्यक्ति एक खंड के बाद दूसरा खंड न पढ़ना चाहे ; अथवा उसे प्राप्त न कर सके, तो उसे यह न लगे कि उसने कोई अधूरी रचना पढ़ी है। फिर इतनी बड़ी रचना के लिए मैं प्रकाशक कहां से लाऊंगा। जिस प्रकाशक को कहो कि मेरा उपन्यास दो सौ पृष्ठों से ऊपर जा रहा है, वही कन्नी काटने लगता था। उन दिनों बाबा नागार्जन प्राय: हमारे घर आया करते थे। वे कहा करते थे कि उपन्यास सौ सवा सौ पृष्ठों से बड़ा हो तो किसी के पास उसे पढ़ने का समय नहीं होता। कदाचित् ऐसे ही कुछ और कारणों से मैंने रामकथा को चार खंडों में लिखने की योजना बनाई। पहला खंड 'दीक्षा' था...''

तो 'दीक्षा' नरेन्द्र कोहली के प्रसिद्ध और समयसिद्ध उपन्यास - अभ्युदय - का प्रथम खंड है।

इस उपन्यास के विषय में विद्वानों ने कहा है :

1. '' 4.45 होता है। अभी पुस्तक पूरी की है। मैं नहीं जानता उपन्यास से क्या अपेक्षा है और क्या उसका शिल्प होता है। प्रतीत होता है आप की रचना उपन्यास के धर्म से ऊंचे उठकर कुछ शास्त्र की कक्षा तक बढ़ जाती है। मैं इसके लिए आपका कृतज्ञ होता और हार्दिक बधाई देता हूं।'' - जैनेन्द्रकुमार

2.''रामकथा को आपने एकदम नई दृष्टि से देखा है।''- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

3.''अपने चरित्रनायक के चित्रण में आप सश्रद्ध भी रहे हैं और सचेत भी।'' -अमृतलाल नागर

4.''... सुप्रतिष्ठित कथा और मौलिक उद्भावना को इस प्रकार समंजित करना कि आधुनिक पाठक उसे उपन्यास के रूप में स्वीकार कर सके,साधारण प्रतिभा के बूते की बात नहीं है। यह आश्चर्य की ही बात है कि नरेन्द्र कोहली ने अपने 'दीक्षा' नामक उपन्यास में यह चमत्कार कर दिखाया है।''- डॉ. गोपालराय

5.''दीक्षा उपन्यास में प्रौढ़ चिंतन के साथ रामकथा को आधुनिक संदर्भ प्रदान करने का जैसा सफल प्रयास लेखक ने किया है, वह अनेक दृष्टियों से साहसिक कदम है।''- डॉ. विजयेन्द्र स्नातक

6.''लेखक की प्रचंड परिश्रमशीलता,धीरज,गंभीर जीवनदृष्टि और महत्वाकांक्षा से मैं स्वयं अभिभूत हूं।''- डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर

घटनाओं की दृष्टि से इस उपन्यास में विश्वामित्र के सिद्धाश्रम में राक्षसों के उत्पात से लेकर राम के विवाह और परशुराम की पराजय तक की कथा वर्णित है। लेखक ने स्थापित किया है कि इस विशाल जंबूद्वीप में हो रहे राक्षसी उत्पात और उसके परिणामस्वरूप सद्मूल्यों के हनन और राक्षसी मूल्यों के भयावने आतंक के विस्तार को देखने और उसका प्रतिरोध करने की दीक्षा ऋषि विश्वामित्र ने राम को दी थी। इस कथा के विभिन्न प्रसंगों में से गुजरते हुए लेखक विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं, जन सामान्य के शोषण, बुद्धिजीवियों के कर्तव्य समाज में नारी का स्थान, स्त्री पुरुष संबंध, जाति और वर्ण की विभीषिकाओं, लोलुप और स्वार्थी बुद्धिजीवियों,राजपुरुषों इत्यादि विषयों के संदर्भ में अत्यंत क्रांतिकारी विश्लेषण करता है;और अपनी मान्यताओं के सहारे एक प्रख्यात कथा को पूर्णत: मौलिक तथा और आधुनिक उपन्यास के रूप में प्रस्तुत कर देता है।

इसका सजिल्द संस्करण वाणी प्रकाशन से उपलब्ध है। यह 'अभ्युदय'में भी सम्मिलित है। हिंद पॉकेट बुक्स में इसका संक्षिप्त रूप अब भी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है।

रामकथा पर आधृत यह उपन्यास शृंखला 1975 . से 1979 . के मध्य प्रकाशित हुई। इन उपन्यासों के नाम थे - दीक्षा, अवसर,संघर्ष की ओर, तथा युद्ध(दो भाग)1989 . में ये चारों उपन्यास एक रचना के रूप में एकीकृत होकर,'अभ्युदय' के नाम से प्रकाशित हुए। यह कृति 2004 . में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हो गई है। साथ ही इसका अजिल्द संस्करण डायंड बुक्स ने प्रकाशित किया है।

हिंद पॉकेट बुक्स प्रा. लि. के द्वारा 'अभ्युदय' के संक्षिप्त रूप को सात खंडों - दीक्षा,अवसर,संघर्ष की ओर,साक्षात्कार,पृष्ठभूमि,अभियान तथा युद्ध - के रूप में प्रकाशित किया गया है।

14.अवसर (उपन्यास)- 1976 .

प्रकाशक : पराग प्रकाशन, दिल्ली - 110032

'अभ्युदय' का दूसरा खंड। इसकी आधारभूमि है रामकथा के अयोध्याकांड की कथा। मूल कथा तो पौराणिक है; किंतु प्रस्तुत कृति सर्वथा समकालीन आधुनिक उपन्यास है, जिसमें आधुनिक परिप्रेक्ष्य और मूल्य-मानकों के आधार पर उस प्राचीन कथा के राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक मूल्यों का विश्लेषण किया गया है।

इसका सजिल्द संस्करण अब वाणी प्रकाशन से उपलब्ध है। यह अभ्युदय में भी सम्मिलित है। हिंद पाकेट बुक्स में इसका संक्षिप्त रूप अब भी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है।

15. प्रेमचंद (आलोचना)- 1976 .

प्रकाशक : विक्रांत प्रेस,दिल्ली - 110052

प्रेमचंद पर तीन महत्वपूर्ण निबंध, जो आलोचना से अधिक सर्जनात्मक साहित्य का अंग प्रतीत होते हैं। संकलित निबंध हैं : 1.प्रेमचंद का महत्व, 2. प्रेमचंद और जनक्रांति, 3.प्रेमचंद के साहित्य-सिद्धांत। यह पुस्तक अब उपलब्ध नहीं है। इसकी सामग्री प्रेमचंद - 1991 . (वाणी प्रकाशन) में सम्मिलित कर ली गई है।

16. जंगल की कहानी (उपन्यास) - 1977 / 2000 .

प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली - 110006

एक शताब्दी पूर्व के पंजाब के उस क्षेत्र की कथा, जहां चारों ओर वन और पर्वत थे। मनुष्य की वन्यवृत्तियों के साथ साथ शासन का जंगल का कानून भी यहां मार्मिकता से चित्रित हुआ है। इसकी सामग्री लेखक ने अपने पिता के अनुभवों और उनके द्वारा तैयार की गई टिप्पणियों से ली है।

इसका पहला संस्करण 1977 . में नेशनल पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित हुआ था। वह संस्करण अब अनुपलब्ध है। सन् 2000 . में इसका अजिल्द संस्करण राजपाल एंड संस, से प्रकाशित हुआ है।

पृष्ठ : 104, मूल्य : पैंतालीस रुपए मात्र।

17. मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं (व्यंग्य) - 1977 .

प्रकाशक : ज्ञान भारती, दिल्ली - 110007

हिंदी का व्यंग्य साहित्य जिस तीव्र गति से आगे बढ़ा, उसी तेजी से पाठकों तथा समीक्षकों ने उससे स्वयं को दोहराने तथा चुक जाने की शिकायत भी की। कदाचित् यही कारण है कि सजग व्यंग्यकारों ने स्वयं को पुनरावृत्ति से बचाने का सक्षम प्रयत्न किया। नरेन्द्र कोहली ऐसे व्यंग्यकार हैं, जिन्होंने स्वयं को परंपरागत व्यंग्य-लेखन में ही बंध नहीं जाने दिया। व्यंग्य के क्षेत्र में इतने शिल्पगत प्रयोग किसी और वरिष्ट व्यंग्यकार ने कदाचित् कभी नहीं किए। किंतु ये प्रयोग केवल प्रयोग के लिए ही नहीं हैं। नरेन्द्र कोहली का कहना है कि प्रत्येक विषय अपने लिए एक विशिष्ट शिल्प की मांग करता है। अत: विषय की विवेचना तथा नवीन दृष्टि के अभाव में नए शिल्प का जन्म नहीं हो सकता।

नरेन्द्र कोहली ने व्यंग्य को सदा सार्थक व्यंग्य के रूप में ग्रहण किया है। वह तीखा, गहरा और नुकीला व्यंग्य है, जिससे कभी अभिधात्मक कटाक्ष हो जाने की शिकायत तो हो सकती है, किंतु वह हल्का नहीं हो सकता।

श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाओं के संकलन के साथ लेखक की व्यंग्य संबंधी एक विस्तृत भूमिका। व्यंग्य लेखन की प्रवृत्ति, सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां, व्यंग्य के स्वरूप तथा व्यंग्य विधा पर लेखक के मौलिक स्वानुभूत विचार। व्यंग्य के शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण सामग्री।

पृष्ठ : 160, मूल्य : दस रुपए

18. कहानी का अभाव (कहानियां)- 1977 / 2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी, दिल्ली - 110009

'संपूर्ण कहानियां' शृंखला का पहला खंड। लेखक की आरंभिक कहानियां, जिनमें किशोर मन के प्रति खुलता हुआ संसार बहुत रोचक ढंग से चित्रित हुआ है। 'कहानी का अभाव' कहानी की विधा संबंधी पूर्वमान्यताओं को सशक्त चुनौती देती है।

इसका पहला संस्करण पराग प्रकाशन, दिल्ली से 1977 . में प्रकाशित हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रह कर अब सन् 2000 . में इसका प्रकाशन क्रियेटिव बुक कंपनी,से अजिल्द संस्करण के रूप में हुआ है। इस की सामग्री 'समग्र कहानियां' -1991 . (वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स) में भी सम्मिलित है।

19. हिंदी उपन्यास : सृजन और सिद्धांत (शोधप्रबंध)- 1977 /1989 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002

हिंदी उपन्यास के आरंभ से सन् 1960 . तक के महत्वपूर्ण उपन्यासकारों के सिद्धांतों का मौलिक और शोधपूर्ण विवेचन। उपन्यास के संदर्भ में उठाए गए, मूलभूत साहित्यशास्त्रीय प्रश्न। कथात्मक साहित्यशास्त्र की आधारभूत स्थापनाएं। लेखक का शोधप्रबंध, जिसपर उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से विद्यावाचस्पति (पी-एच.डी.) की उपाधि प्राप्त हुई।

इसका प्रथम संस्करण सौरभ प्रकाशन, दिल्ली से 1977 . में प्रकाशित हुआ था। उस संस्था के बंद हो जाने के पश्चात् यह 1989 . में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ।

पृष्ठ : 295, मूल्य : एक सौ पच्चीस रुपए मात्र।


20. संघर्ष की ओर (उपन्यास)-1978 .

प्रकाशक : पराग प्रकाशन, दिल्ली - 110032

'अभ्युदय' का तीसरा खंड। इसकी कथा रामकथा के अरण्यकांड पर आधृत है। आदिवासी जातियों के उत्थान, उनके शोषण के विभिन्न आयामों और शोषण के विरुद्ध जनसंगठन की समस्याओं का औपन्यासिक कलात्मक विवेचन।

इसका सजिल्द संस्करण वाणी प्रकाशन से उपलब्ध है। यह 'अभ्युदय' - 1989 (वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स) में भी सम्मिलित है। हिंद पाकेट बुक्स में इसका संक्षिप्त रूप अब भी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है।


21. गणित का प्रश्न (बाल कथाएं) - 1978 .

प्रकाशक : प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली - 110030

बच्चों के लिए आधुनिक ढंग की नई कहानियां, जो उनके अपने जीवन से ही ली गई हैं। यह पुस्तक अब उपलब्ध नहीं है। इस की सामग्री 'एक दिन मथुरा में तथा अन्य कहानियां' (हिंद पाकेट बुक्स)- 2004 . में सम्मिलित कर ली गई है।


22.आधुनिक लड़की की पीड़ा (व्यंग्य)-1978 / 2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी, दिल्ली - 110009

लेखक की व्यंग्य रचनाओं का चौथा संकलन। नए विषयों पर तीव्र व्यंग्यात्मक शैली में अपने समसामयिक समाज का विश्लेषण। अब यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है। इस की सामग्री समग्र व्यंग्य (वाणी प्रकाशन)-1998 . में संकलित कर ली गई है। स्वतंत्र रूप से इसका अजिल्द संस्करण 2000 . में क्रियेटिव बुक कंपनी,दिल्ली से प्रकाशित हुआ है।

23. युद्ध (दो भाग), उपन्यास - 1979 .

प्रकाशक : पराग प्रकाशन, दिल्ली- 110032

'अभ्युदय' का चौथा और अंतिम भाग। रामकथा के किष्किंधा,सुंदरकांड तथा लंकाकांड के आधार पर, दो जिल्दों में लिखा गया वृहद् उपन्यास। इसका सजिल्द संस्करण वाणी प्रकाशन से उपलब्ध है। यह 'अभ्युदय' (वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स) में भी सम्मिलित है। हिंद पाकेट बुक्स में इसका संक्षिप्त रूप अब भी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है।

24. दृष्टि देश में एकाएक (कहानियां)- 1979/2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी, दिल्ली - 110009

'संपूर्ण कहानियां' शृंखला का दूसरा खंड। पारिवारिक और सामाजिक परिवेश का एक युवा दृष्टि द्वारा मर्मभेदी और बेबाक विश्लेषण। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विद्रोह, पीढ़ियों के वैपरीत्य तथा परंपरा विरोध के इस युग में भी इस युवा लेखक ने अपनी पिछली पीढ़ी को अपनी कहानियों में भरपूर सहानुभूति दी है। अब यह संकलन स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसकी सामग्री 'समग्र कहानियां' (वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स)-1991 . में सम्मिलित कर ली गई है।

इसका पहला संस्करण पराग प्रकाशन, दिल्ली से 1979 . में प्रकाशित हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रह कर अब सन् 2000 . में इसका प्रकाशन क्रियेटिव बुक कंपनी से अजिल्द संस्करण के रूप में हुआ है।

25. अभिज्ञान (उपन्यास)- 1981 .

प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली -110006

कृष्ण और सुदामा की प्रख्यात् कथा पर आधृत पौराणिक दार्शनिक उपन्यास, जिसमें गीता के कर्म-सिद्धांत की नई,रोचक और औपन्यासिक व्याख्या की गई है।

आलोचक कहते हैं :

1. ''नरेन्द्र कोहली ने कृष्ण तथा सुदामा के चरित्रों द्वारा,कर्म-सिद्धांत की जिस शैली से स्थापना की है, वह दर्शन की गूढ़ गंभीर गुत्थी न होकर,अनुभव और व्यवहार की सहज भाषा है। यही उपन्यास की शक्ति है। कृष्ण-सुदामा की कथा को इस प्रकार सार्थक बनाया गया है।''- डॉ. विजयेन्द्र स्नातक

2. ''अभिज्ञान अतीत से संबद्ध होकर भी अपनी संवेदना,दृष्टि,विचार,चिंतन और विश्लेषण में पूर्णत: नया और आधुनिक है। इसी अर्थ में यह एक विशिष्ट उपन्यास है, जिसकी फैंटसी में पुनर्रचित भारतीय समाज और संस्कृति पूरी तरह प्रतिबिंबित हो उठे हैं।''- कौशल किशोर

3. ''अभिज्ञान में बुद्धिजीवियों की आपने अपेक्षित और उचित खिंचाई की है। मुझे तो कभी कभी लगता है कि हमारे देश की जो दुर्दशा हो रही है, उसका सारा दायित्व बुद्धिजीवियों पर ही है। जो लोग कृष्ण और उनके कर्मयोग को नहीं समझते, उनके लिए तो यह उपन्यास अवश्य पठनीय है। दोनों ही बिंदुओं को आपने बड़ी सहृदयता के साथ व्याख्यायित किया है।'' - श्रवणकुमार गोस्वामी

4. '' 'अभिज्ञान' में वैदिक ऋत सिद्धांत अथवा प्रकृति की नियमबद्धता में मानवीय कर्म की कड़ी को जोड़ते हुए, यह स्थापित किया गया है कि कर्म का फल और अकर्म का दंड प्रकृति देती है। हम प्राकृतिक सहज तंत्र से स्वयं को पृथक् कर लेते हैं, इसीलिए हमें इन विरोधों और विसंगतियों को भुगतना पड़ता है। इसके लिए दोषी व्यक्तिगत मानवीय कर्म और सामूहिक रूप में सामूहिक मानवीय कर्म है, जिसे न समझ पाने के कारण, हम यह शिकायत करते हैं कि हमें कर्म का उचित फल नहीं मिला।

''एक बात और। पाठकों को सूचित करना मेरा कर्तव्य होगा कि ऋत, कर्म-सिद्धांत, अध्यात्म, विज्ञान आदि भारी भरकम शब्दों से बिना आतंकित हुए, इस उपन्यास को पढ़ा जा सकता है; क्योंकि बौद्धिक रस के साथ ही साथ, कथा का अद्भुत प्रवाह भी इस रचना में है।''- डॉ. मीरा सीकरी

पृष्ठ : 232 , मूल्य : पचहत्‍तर रुपए मात्र।


26. शटल (कहानियां)- 1982/2000

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी, दिल्ली - 110009

'संपूर्ण कहानियां' शृंखला का तीसरा खंड। लेखक की कुछ प्रौढ़ कहानियों का महत्वपूर्ण संकलन। अब यह संकलन स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसकी सामग्री 'समग्र कहानियां' (वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स)- 1991 . में सम्मिलित कर ली गई है।

इसका पहला संस्करण पराग प्रकाशन, दिल्ली से 1982 . में प्रकाशित हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रह कर अब सन् 2000 . में इसका प्रकाशन क्रियेटिव बुक कंपनी से अजिल्द संस्करण के रूप में हुआ है।


27. त्रासदियां (व्यंग्य)-1982 .

प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली - 110006

लेखक की व्यंग्य रचनाओं का पांचवां संकलन। व्यंग्य के साथ विनोद की ओर विशेष झुकाव। अब यह संकलन स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसकी रचनाएं समग्र व्यंग्य (वाणी प्रकाशन)-1998 . में सम्मिलित कर ली गई हैं।

28. नेपथ्य (आत्मपरक निबंध)-1983 .

प्रकाशक : किताब घर, नई दिल्ली - 110002

अपनी रचना प्रक्रिया, कृतित्व, और संबंधों के विषय में लेखक के ईमानदार, बेबाक सर्जनात्मक निबंध, जो उतने ही रोचक हैं, जितनी कोई कथाकृति हो सकती है। अब यह पुस्तक स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसके अधिकतर निबंध 'एक व्यक्ति नरेन्द्र कोहली' (संपादक: कार्त्तिकेय कोहली, प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी,दिल्ली)- 2000 . में सम्मिलित कर लिए गए हैं।

29. नमक का कैदी (कहानियां)-1983 /2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी, दिल्ली - 110009

'संपूर्ण कहानियां' शृंखला का चौथा खंड। 1967-68 के दौरान लिखी गई, कुछ महत्‍त्‍वपूर्ण कहानियों का संकलन। अब यह संकलन स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसकी सामग्री 'समग्र कहानियां' (वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स)-1991 . में सम्मिलित कर ली गई है।

इसका पहला संस्करण पराग प्रकाशन, दिल्ली से 1983 98. में प्रकाशित हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रह कर अब सन् 2000 . में इसका प्रकाशन क्रियेटिव बुक कंपनी से अजिल्द संस्करण के रूप में हुआ है।


30. आत्मदान (उपन्यास)-1983 ./2008 .

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद- 1 / हिंद पाकेट बुक्‍स, नई दिल्‍ली - 110003

सम्राट् हर्षवर्घन के बड़े भाई, राज्यवर्धन, के जीवन पर आधृत एक अनोखा और रोचक उपन्यास, जो राज्यवर्धन के चरित्र के नए आयाम उद्घाटित करता है।


31. निचले फ्लैट में (कहानियां)- 1984 /2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी, दिल्ली -110009

'संपूर्ण कहानियां' शृंखला का पांचवां खंड। 1969-70 . की अवधि में लिखी गई कहानियां। समाज में बढ़ती हुई अमानवीयता के स्पष्ट चित्र। उपन्यास तत्व की वृद्धि। अब यह संकलन स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसकी सामग्री 'समग्र कहानियां' (वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स)-1991 . में सम्मिलित कर ली गई है।

इसका पहला संस्करण पराग प्रकाशन, दिल्ली से 1984 . में प्रकाशित हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रह कर अब सन् 2000 . में इसका प्रकाशन क्रियेटिव बुक कंपनी से अजिल्द संस्करण के रूप में हुआ है।


32. नरेन्द्र कोहली की कहानियां (कहानियां)-1984 .

प्रकाशक : विकास पेपर बैक्स, दिल्ली- 110032

अजिल्द संस्करण में पहला कहानी संग्रह। छह लंबी और औपन्यासिक कहानियों का पठनीय और आकर्षक संकलन। अब यह संकलन स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसकी सामग्री 'समग्र कहानियां' (अभिरुचि प्रकाशन)-1991 . में सम्मिलित कर ली गई है।


33. संचित भूख (कहानियां)- 1985/2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी, दिल्ली - 110009

1969-75 . की अवधि में लिखी गई कहानियां। इन कहानियों में जन सामान्य के मनोविज्ञान क साथ साथ, प्रशासन की क्रूरता तथा परिस्थितियों द्वारा प्रताड़ित लोगों की असहायता प्रमुख है। अब यह संकलन स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसकी सामग्री 'समग्र कहानियां' (वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स)-1991 . में सम्मिलित कर ली गई है।

इसका पहला संस्करण पराग प्रकाशन, दिल्ली से 1985 . में प्रकाशित हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रह कर अब सन् 2000 . में इसका प्रकाशन क्रियेटिव बुक कंपनी से अजिल्द संस्करण के रूप में हुआ है।


34. आसान रास्ता (बाल कथाएं)-1985

प्रकाशक : किताबघर, नई दिल्ली - 110002

किशोरों के लिए दस आकर्षक कहानियों का संकलन। अब यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है। इस की सामग्री कुकुर तथा अन्य कहानियां ( हिंद पाकेट बुक्स ) - 2000 . में सम्मिलित कर ली गई है।

35. निर्णय रुका हुआ(नाटक)-1985 .

प्रकाशक : कल्पतरु, दिल्ली - 110032

'निर्णय रुका हुआ' एक साधारण परिवार की इच्छाओं -आकांक्षाओं की कहानी है; किंतु जैसे जैसे नाटक आगे बढ़ता जाता है, परत-दर-परत इस देश की जड़ों में समाया भ्रष्टाचार उद्घाटित होता जाता है। सामान्य जन ईमानदारी से अपनी सीधी सच्ची राह पर चले या सुख सुविधा पाने के लिए भ्रष्टाचार की दलदल वाला सुगम मार्ग अपना ले -- यह द्वंद्व इस समाज में अभी चल रहा है। सामान्य जन सीधी सच्ची राह का समर्थक है; किंतु अपने मार्ग में खड़ी विघ्न बाधाओं से टकरा जाने का निश्चय अभी कर नहीं पा रहा है। इसलिए निर्णय अभी स्थगित है।

नरेन्द्र कोहली की कलम के कई आयाम हैं। इस कृति में आपको उनके नाटककार, कथाकार और व्यंग्यकार का समन्वित रूप मिलेगा। आप इसमें डूबते, आकस्मिकता में चौंकते और कचोट से तिलमिलाते, एक विराट प्रश्न के आमने-सामने खड़े हो जाएंगे -- कौन सा मार्ग आप का है?

राजनीति, प्रशासन और न्यायपालिका के बीच घिरे, और धन के अभाव तथा आकांक्षाओं के बाहुल्य से प्रताड़ित समाज की कहानी। भ्रष्टाचार के राक्षस का रोम-रोम उद्घाटित करता, पाठक में स्फूर्ति जगाता, एक पूर्ण और सहज मंचनीय नाटक।

पृष्ठ : 104, मूल्य : बीस रुपए मात्र।


36. हत्यारे(नाटक)- 1985 .

प्रकाशक : कल्पतरु, दिल्ली - 110032

'हत्यारे' एक हत्या की कहानी है, जो मानव समाज के संदर्भ में अनेक मौलिक प्रश्नों का साक्षात्कार कराती है। हत्याएं केवल शस्त्रों से नहीं होतीं। हत्याओं के अनेक रूप हैं ; और हत्यारों के भी। अपने स्वार्थवश व्यक्ति यह भी नहीं जानना चाहता कि उसके किस कृत्य का परिणाम क्या होगा। अपने कृत्य से वह कार्य-कारण की एक ऐसी शृंखला आरंभ कर देता है, जिसके मध्य और अंत की वह कल्पना भी नहीं कर सकता।

'हत्यारे' भारतीय समाज के अनेक आयामों को इतनी नाटकीयता से उद्घाटित करता है कि दर्शक दंग रह जाता है। घटना एक ही है, किंतु प्रत्येक नई स्थिति के साथ, उसका रूप बदल जाता है। दर्शक अपने पहचाने हुए समाज को कुछ और अधिक पहचानने लगता है।

घर और घर के बाहर, समाज और प्रशासन में छिपे, हत्यारों के कृत्यों को उद्घाटित करता एक प्रखर व्यंग्यात्मक नाटक। एक साधारण सी घटना को प्रत्येक अगली पंक्ति के साथ नाटककार असाधारण और गंभीर घटना में बदलता चलता है। सहज मंचनीय, गहरी पकड़ वाला नाटक।

पृष्ठ : 95 , मूल्य : बीस रुपए मात्र।



37. गारे की दीवार(नाटक)-1986 .

प्रकाशक : कल्पतरु, दिल्ली - 110032

समाज में धन का महत्व बहुत बढ़ा है। धन के महत्व के अनुपात में व्यक्ति में अहंकार भी बढ़ा है। अहंकार ने प्रदर्शनप्रियता और ईर्ष्या-द्वेष को प्रोत्साहित किया है।... और क्रमश: यह खेल खतरनाक होता गया है। सामाजिक मूल्यों का क्षय हुआ और घर-घर में अपराध मनोवृत्ति फलने-फूलने लगी। यह अपराधवृत्ति परिवार, समाज और देश -- तीनों को ही खोखला कर रही है। इसका अंत कहां होगा?

नरेन्द्र कोहली का यह नाटक एक साधारण परिवार की एक बहुत छोटी सी घटना को लेकर आरंभ होता है, किंतु प्रत्येक नई पंक्ति के साथ वह सामाजिक संबंधों की परतें उधेड़ता चलता है; और अंतत: वह हमें एक व्यापक सत्य के सामने खड़ा कर देता है। वह सत्य जो किसी एक वर्ग विशेष के सम्मुख नहीं, आज सारे राष्‍ट्र और संपूर्ण मानवता के सामने खड़ा है।

मध्यम वर्ग की आडंबरप्रियता, ईर्ष्या और अहंकार का चित्रण, जो अंतत: उनके जीवन को अपराध के विष से भरता जा रहा है।

पृष्ठ : 70 , मूल्य : पंद्रह रुपए मात्र।


38. प्रीतिकथा(उपन्यास)-1986 .

प्रकाशक : किताबघर, नई दिल्ली - 110002

नरेन्द्र कोहली की प्रत्येक नई कृति उनके लेखकीय व्यक्तित्व का एक नया आयाम उद्घाटित करती है। जब तक आलोचक तथा पाठक उन्हें किसी एक विशेष वर्ग अथवा धारा से जोड़ कर, किसी एक घेरे में घेर कर, देखने के अभ्यस्त होने लगते हैं, तब तक वे उन घेरों को तोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं; तथा कुछ और नया और मौलिक लिखने लगते हैं।

'प्रीतिकथा' नरेन्द्र कोहली का नया उपन्यास है। नरेन्द्र कोहली ने प्रेमकथा लिखी है -- यह सूचना कुछ लोगों के लिए विस्मयकारी भी हो सकती है; किंतु अधिक विस्मयकारी तथ्य तो यह है कि यह प्रेमाख्यानक उपन्यास, जीवन के कुछ मूलभूत सत्यों का स्वरूप स्पष्ट करता है। कुछ लोग इसे चिंतनप्रधान ही नहीं, दार्शनिक उपन्यास भी कहना चाहेंगे। प्रेम का विश्लेषण करते-करते ही, मनुष्य अपनी प्रकृति और ईश्वर के स्वरूप तक को पहचान पाया है। किसी भी वर्ग में रखें, किंतु है यह उपन्यास ही-- पहले से भिन्न, नया, ताज़ा और आकर्षक।

अब यह हिंद पाकेट बुक्स में भी उपलब्ध है।

पृष्ठ : 128, मूल्य : अस्सी रुपए मात्र।


39. परेशानियां (व्यंग्य)-1986 /2000 .

प्रकाशक : क्रियेटिव बुक कंपनी, दिल्ली - 110009

व्यंग्य का नवीन संकलन, जिसमें हास्य और व्यंग्य के साथ कुछ उत्कृष्ट विनोदी रचनाएं भी हैं। यह पुस्तक अब उपलब्ध नहीं है। इसकी रचनाएं 'समग्र व्यंग्य' (वाणी प्रकाशन)-1998 . में सम्मिलित कर ली गई हैं।

इसका पहला संस्करण किताबघर, दिल्ली से 1986 . में प्रकाशित हुआ था। कुछ समय तक अनुपलब्ध रह कर अब सन् 2000 . में इसका प्रकाशन क्रियेटिव बुक कंपनी से अजिल्द संस्करण के रूप में हुआ है।


40. बाबा नागार्जन (संस्मरण)-1987 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली- 110002

'बाबा नागार्जन' के विषय में संस्मरणात्मक लंबा निबंध तथा नरेन्द्र कोहली के नाम लिखे गए, बाबा के लगभग डेढ़ सौ पत्र।


41. महासमर- 1 (बंधन) -उपन्यास - 1988 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002









पाठक पूछता है कि यदि उसे महाभारत की ही कथा पढ़नी है तो वह व्यास-कृत मूल महाभारत क्यों न पढ़े, नरेन्द्र कोहली का उपन्यास क्यों पढ़े ? वह यह भी पूछता है कि उसे उपन्यास ही पढ़ना है, तो वह समसामयिक सामाजिक उपन्यास क्यों न पढ़े, नरेन्द्र कोहली का 'महासमर' क्यों पढ़े ? ?

'महाभारत' हमारा काव्य भी है, इतिहास भी और अध्यात्म भी। हमारे प्राचीन ग्रंथ शाश्वत सत्य की चर्चा करते हैं। वे किसी कालखंड के सीमित सत्य में आबद्ध नहीं हैं, जैसा कि यूरोपीय अथवा यूरोपीयकृत मस्तिष्क अपने अज्ञान अथवा बाहरी प्रभाव में मान बैठा है। नरेन्द्र कोहली ने न महाभारत को नए संदर्भों में लिखा है, न उसमें संशोधन करने का कोई दावा है। न वे पाठक को महाभारत समझाने के लिए, उसकी व्याख्या मात्र कर रहे हैं। वे यह नहीं मानते कि महाकाल की यात्रा, खंडों में विभाजित है, इसलिए जो घटनाएं घटित हो चुकीं, उनसे अब हमारा कोई संबंध नहीं है। सत्य तो यह है कि न तो प्रकृति के नियम बदले हैं, न मनुष्य का मनोविज्ञान। मनुष्य की अखंड कालयात्रा को इतिहास खंडों में बांटे तो बांटे, साहित्य उन्हें विभाजित नहीं करता, यद्यपि ऊपरी आवरण सदा ही बदलते रहते हैं।

महाभारत की कथा भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति की अमूल्य थाती है। नरेन्द्र कोहली ने उसे ही अपने उपन्यास का आधार बनाया है। 'महासमर' की कथा मनुष्य के उस अनवरत युद्ध की कथा है, जो उसे अपने बाहरी और भीतरी शत्रुओं के साथ निरंतर करना पड़ता है। वह उस संसार में रहता है, जिसमें चारों ओर लोभ और स्वार्थ की शक्तियां संघर्षरत हैं। बाहर से अधिक उसे अपने भीतर लड़ना पड़ता है। परायों से अधिक उसे अपनों से लड़ना पड़ता है। और यदि वह अपने धर्म पर टिका रहता है, तो वह इसी देह में स्वर्ग जा सकता है -- इसका आश्वासन 'महाभारत' देता है। लोभ, त्रास और स्वार्थ के विरुद्ध धर्म के इस सात्विक युद्ध को नरेन्द्र कोहली एक आधुनिक और मौलिक उपन्यास के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।... और वह है 'महासमर'। आप इसे पढ़ें और स्वयं अपने-आप से पूछें -- आपने इतिहास पढ़ा? पुराण पढ़ा? धर्मग्रंथ पढ़ा अथवा एक रोचक उपन्यास? इसे पढ़ कर आपका मनोरंजन हुआ? आपका ज्ञान बढ़ा? अथवा आपका विकास हुआ? क्या आपने इससे पहले कभी ऐसा कुछ पढ़ा था?

'महासमर' का पहला खंड है 'बंधन' । इस खंड की कथा सत्यवती के हस्तिनापुर आगमन से आरंभ हो, हस्तिनापुर से विदा होकर वेदव्यास के आश्रम में जाने तक चलती है। संपूर्ण उपन्यास 'महासमर' के नायक यद्यपि युधिष्ठिर हैं; किंतु इस खंड के मुख्य पात्र भीष्म और सत्यवती हैं।

आचार्य विष्णुकांत शास्त्री का मत है : ''प्रसिद्ध उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली ने रामकथा के यशस्वी समकालीन चित्रण के अनंतर, महाभारत की औपन्यासिक पुनर्सृष्टि करते समय भी अपने उत्‍तरदायित्व का गंभीरतापूर्वक निर्वाह करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। महाभारत सामान्य काव्य नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति का विश्वकोश है। उसपर कलम चलाते समय, दायित्वबोधसंपन्न स्रष्टा को एक साथ दो चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। वह प्राचीन को अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार न तो बदल सकता है और न उसे तद्वत् चित्रित कर अपने विवेक और समकालीन बोध को संतुष्ट ही कर सकता है। उसे पुरानी प्रामाणिकता को बनाए रख कर नई व्याख्याओं के द्वारा उसकी सर्वकालीनता को आधुनिक संदर्भों में उजागर करने का दुरूह कार्य करना पड़ा है। हमें इस बात का संतोष है कि नरेन्द्र कोहली एक बड़ी सीमा तक अपने इस गहन पुनर्सृष्टिपरक यज्ञ में सफल हो पाए हैं।''

पृष्ठ : 472, मूल्य : दो सौ पचास रुपए मात्र।


42. माजरा क्या है? (सर्जनात्मक, संस्मरणात्मक, विचारात्मक निबंध)-1989 .

प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली - 110006

इस पुस्तक में चार सर्जनात्मक, संस्मरणात्मक, विचारात्मक निबंध हैं। उनका विषय है -- पुस्तकें ! समाज में पुस्तकों के महत्व से लेकर लेखक-प्रकाशक-संपादक के संबंधों तक। पुस्तक संसार के संदर्भ में लेखक की महत्वपूर्ण सर्जनात्मक टिप्पणियां।

पृष्ठ : 88, मूल्य : पच्चीस रुपए मात्र

43. अभ्युदय (दो भाग) - उपन्यास - 1989 /1998 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स।

रामकथा का जो खंड लिखा जाता रहा, प्रकाशित होता रहा। उसके सारे भाग अलग अलग नामों से प्रचारित हुए। वह आरंभ में चार खंडों और पांच जिल्दों में प्रकाशित हुई थी। किंतु आरंभ से ही लेखक के मन में था कि कतिपय व्यावहारिक कारणों से वह कृति उतने भागों और जिल्दों में प्रकाशित हुई है, अन्यथा मूल रूप से वह एक ही कृति है। 'अभ्युदय' के रूप में वह पहली बार एकीकृत रूप में प्रकाशित हुई। दीक्षा, अवसर, संघर्ष की ओर, तथा युद्ध (दोनों भाग) इसमें सम्मिलित हैं।

पृष्ठ : 701 + 592 , मूल्य : 400+400 रुपए मात्र।

44. महासमर - 2, (अधिकार) - उपन्यास - 1900 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002

'महासमर' का दूसरा भाग। कथा की दृष्टि से इसमें पांडवों के शतशृंग के आश्रमों से हस्तिनापुर में आने से आरंभ होकर युधिष्ठिर के युवराज्याभिषेक तक की घटनाओं को सम्मिलित किया गया है। कृष्ण का प्रवेश भी इसी खंड में होता है।

प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ. शशिप्रभा शास्त्री कहती हैं, ''निश्चित् ही पुस्तक का रचनाक्रम तथा प्रस्तुतिकरण रोचक, व्यवस्थित और पूर्वापर से संबद्ध है, महाभारत की कथा के आधार पर जिन पात्रों के चरित्र की सपाट सी कल्पना पाठक के मन में आज तक चली आ रही थी, उसके स्थान पर लेखक ने, पाठक के मन:चक्षुओं के सम्मुख, हर पात्र का अंत:संसार खोल कर रख दिया है, मात्र खोला नहीं, एक-एक कर परत-दर-परत उसे आच्छादित किया है, इस रूप में कि पाठक मात्र कथा से ही नहीं, पात्रों के अणु-अणु से परिचित होकर, उनसे अनुकूल भावना से संयुक्त होता चलता है, उन्हें पूर्णरूपेण पहचान लेता है। भीम, नकुल, सहदेव, दुर्योधन, विदुर -- कोई भी तो अस्पष्ट, अजनबी नहीं रह जाता। सब खूब पहचाने से लगते हैं। अपने निज के सुख-दुख में मिलाते, घुलाते हुए।''

पृष्ठ : 383, मूल्य : दो सौ पच्चीस रुपए मात्र।

45. नरेन्द्र कोहली: चुनी हुई रचनाएं (संकलन)- 1990 .

प्रकाशक : किताबघर, नई दिल्ली - 110002

लेखक की पचासवीं वर्षगांठ पर प्रकाशित पुस्तक, जिसमें कहानियां, व्यंग्य, छह उपन्यासों के महत्वपूर्ण अंश, संस्मरण, एक संपूर्ण नाटक तथा कुछ निबंध संकलित हैं। लेखक के संपूर्ण कृतित्व को समझने में सहायक पुस्तक। यह पुस्तक अब उपलब्ध नहीं है।


46. समग्र नाटक (नाटक) - 1990 .

प्रकाशक : पुस्तकायन, नई दिल्ली - 110002

छह नाटक -- शंबूक की हत्या, हत्यारे, निर्णय रुका हुआ, गारे की दीवार, प्रतिद्वंद्वी तथा नीन्द आने तक -- एक साथ, एक जिल्द में प्रकाशित। इसमें संकलित दो नाटक -- प्रतिद्वंद्वी तथा नीन्द आने तक -- पूर्वप्रकाशित नहीं हैं। प्रतिद्वंद्वी महाभारतकथा के एक अंश पर आधृत है, जिसमें सत्यवती, अंबा तथा भीष्म प्रमुख पात्र हैं। इसका कथानक मुख्यत: सत्यवती के मनोविज्ञान पर आधृत है, जो पहले भीष्म को और बाद में अंबा को अपना प्रतिद्वंद्वी मानती है।

दूसरा नाटक नीन्द आने तक, आकार में लघु होने पर भी, समाज में नारी के स्थान को लेकर महत्वपूर्ण है। यह नाटक नारी की सामाजिक स्थिति के संबंध में मात्र सैद्धांतिक चर्चा ही नहीं करता, वरन् घटनाओं तथा मानव मनोविज्ञान के उन कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को छूता है, जो अपने यथार्थ की भीषणता से पाठक तथा दर्शक को झकझोर देते हैं।

यह पुस्तक अब उपलब्ध नहीं है।

47. समग्र व्यंग्य (व्यंग्य)- 1991 .

प्रकाशक : किताबघर, नई दिल्ली - 110002

इस पुस्तक में लेखक की 1991 . तक की सारी व्यंग्य रचनाएं संकलित कर दी गई हैं। पूर्वप्रकाशित व्यंग्य पुस्तकें -- एक और लाल तिकोन, पांच एब्सर्ड उपन्यास, जगाने का अपराध, आश्रितों का विद्रोह, आधुनिक लड़की की पीड़ा,त्रासदियां तथा परेशानियां, इसमें सम्मिलित हैं। इस एक पुस्तक के माध्यम से व्यंग्यकार नरेन्द्र कोहली के विकास और रचना संसार को सहज ही जाना और समझा जा सकता है।

यह पुस्तक अब उपलब्ध नहीं है।

48. एक दिन मथुरा में (बाल उपन्यास) - 1991 .

प्रकाशक : पराग प्रकाशन, दिल्ली -110032

अस्सी पृष्ठों में बच्चों के लिए एक रोचक उपन्यास, जिसमें वैज्ञानिक फंतासी के साथ-साथ, बच्चों को अपनी सांस्कृतिक परंपरा का भी परिचय दिया गया है।

यह पुस्तक अब स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसे 'एक दिन मथुरा में तथा अन्य कहानियां' (हिंद पाकेट बुक्स)-2004 . में सम्मिलित कर लिया गया है।

49. हम सब का घर (बाल उपन्यास)- 1991 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002

पर्यावरण के विषय में लिखा गया, बच्चों के लिए एक अत्यंत रोचक उपन्यास । इसमें सारी घटनाएं एक परिवार के दैनन्दिन जीवन के चारों ओर घूमती हैं। बच्चों की बालक्रीड़ाओं और मनोरंजन को साथ लेकर चलती हैं, और उन्हें समझाती हैं कि पर्यावरण क्या है, उसका महत्व क्या है, उसे दूषित कौन कर रहा है और उसकी रक्षा कैसे की जा सकती है।

पृष्ठ : 63, मूल्य : तीस रुपए

50.समग्र कहानियां (कहानियां) भाग - 1, 1991 . भाग - 2, 1992 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स।

1992 . तक लिखी गई सारी कहानियों का संग्रह। लेखक ने अपनी भूमिका में कहा है, ''जिधर दृष्टि जाती थी, कोई न कोई कहानी दीख जाती थी - अपने भीतर भी, अपने बाहर भी। फिर भी मेरी आरंभिक कहानियां इस अर्थ में काफी आत्मकेंद्रित रही हैं कि उनकी सारी सामग्री मैंने अपने परिवार और निकट संबंधियों के व्यक्तिगत जीवन से ही ली हैं। अबोध शैशव को पीछे छोड़ आए, पहली बार आंखें खोलते हुए, तरुण मन के लिए शायद यही स्वाभाविक था। प्रतिदिन पारिवारिक सामाजिक जीवन के किसी न किसी नए तथ्य का उद्घाटन हो रहा था। अपने आस पास घटती घटनाओं की अनुभूतियों का ताजापन और उनके प्रति तीखी प्रतिक्रिया मुझे कहानी लिखने को बाध्य कर रही थी। कॉलेज के नए नए अनुभव, हल्के हल्के रोमांस, घर में पहला विवाह, नए बनते संबंध और पुराने संबंधों के प्रति विद्रोह जैसे उपकरण मुझे अनायास ही सुलभ हो गए थे; और मेरे पास था मस्ती से भरा तथा लोगों को कोंचने को आतुर मन, चुहल से कटाक्ष तथा विद्रूप तक जाती वाणी, स्वयं को बड़ों के बराबर मनवाने का किशोर प्रयास... क्योंकि बड़ों के गरिमायुक्त व्यक्तित्व क्रमश: हल्के पड़ते जा रहे थे। आरंभिक कहानियों में घटनाओं के नाटकीय संयोजन से, विसंगतियों तथा दोहरे मानदंडों पर प्रहार करना ही शायद मेरा प्रमुख उद्देश्‍य था। आज सोचता हूं तो लगता है कि शायद अपने विद्रोह की घोषणा करने के लिए ही मैंने कहानियां लिखी थीं।''

अब यह पुस्तक वाणी प्रकाशन तथा डायमंड बुक्स से उपलब्ध है।

पृष्ठ : 391 + 318, मूल्य : 200+ 200 रुपए मात्र।


51. प्रेमचंद (समीक्षा) - 1991 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002

इस पुस्तक में प्रेमचंद संबंधी समीक्षात्मक-सृजनात्मक निबंध - प्रेमचंद का महत्व, प्रेमचंद का चिंतन तथा प्रेमचंद के साहित्य सिद्धांत - संकलित हैं। प्रेमचंद संबंधी पूर्वप्रकाशित दोनों पुस्तकों की सारी सामग्री इसमें आ गई है। इन निबंधों के माध्यम से प्रेमचंद साहित्य को समझने के अनेक नए आयाम उद्घाटित हुए हैं।

पृष्ठ : 264, मूल्य : एक सौ पचास रुपए मात्र (1991 .)


52. महासमर - 3, (कर्म), - उपन्यास - 1991 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली- 110002

'महासमर' का तीसरा भाग, जिसमें वारणावत कांड से लेकर, द्रौपदी के स्वयंवर के पश्चात् पांडवों के पुन: हस्तिनापुर आने तथा हस्तिनापुर राज्य के विभाजन की कथा है। इसमें घटनाओं का आकर्षण तो है ही, साथ ही युधिष्ठिर के साथ-साथ भीम और अर्जुन का महत्व भी, उनके असाधारण कृत्यों के माध्यम से स्थापित होता है। वारणावत में पांडवों को मृत्यु के मुख से बचाने तथा संपूर्ण जंबूद्वीप के राजाओं एवं महत्वपूर्ण लोगों के सम्मुख पुनर्जीवित करने के लिए, उत्‍तरदायी लोगों और घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण एवं चित्रण है। प्रेम, विवाह तथा धर्म संबंधी मान्यताओं के बीच द्रौपदी के पंचपतित्व की व्याख्या भी उपन्यास की ही घटनाओं के समान रोचक है। अंतत: पांडवों को राज्याधिकार देने का सत्य भी खुल कर सामने आता है। खांडवप्रस्थ का राज्य युधिष्ठिर का राज्याभिषेक था अथवा पांडवों को फिर एक बार हस्तिनापुर से निष्कासित कर मृत्यु के मुख में झोंक देने का एक अत्यंत जटिल षड्यंत्र।

भारत भारद्वाज ने लिखा, '' नरेन्द्र कोहली ने महाभारत की घटनाओं एवं पात्रों को इन उपन्यासों में मात्र उठाया ही नहीं है, बल्कि उनके पीछे जो सच्चाइयां दब गई थीं, उन्हें अनावृत भी किया है। कथा, पात्रों में छिपे अर्थ का पुनर्सृजन किया है। सब से बड़ी बात, महाभारत के पात्रों के मानसिक अंतर्द्वन्‍द्व को गहराई से मूर्त किया है। चाहे वह कुंती का अंतर्द्वन्‍द्व हो या कर्ण अथवा भीष्म पितामह का। कोहली जी ने बहुत धैर्य एवं परिश्रम से एक-एक पात्र की मानसिकता में प्रवेश कर उनका चित्रण किया है। महाभारत के अधिकांश पात्र, यहां एक नई अर्थदीप्ति से चमक उठे हैं। इस अर्थ में यह उपन्यास-शृंखला, जानी या पढ़ी हुई कहानी को मात्र जानना या पढ़ना नहीं है, बल्कि हस्तिनापुर में अपनी आंखें से नए दृष्टिकोण से उन्हें देखना भी है। इसीलिए यह उपन्यास-शृंखला, मौलिक उपन्यास पढ़ने का आनन्द देती है।''

पृष्ठ : 392, मूल्य : दो सौ पच्चीस रुपए मात्र।

53. 'तोड़ो कारा तोड़ो' - 1 (निर्माण) - उपन्यास - 1992 .

प्रकाशक : किताबघर, नई दिल्ली- 110002

'तोड़ो कारा तोड़ो' स्वामी विवेकानन्द की जीवनकथा पर आधृत उपन्यास है। इस वृहत् उपन्यास का प्रथम खंड निर्माण स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व के निर्माण के विभिन्न आयामों तथा चरणों की कथा कहता है। इस की कथा उनके जन्म से,श्रीरामकृष्ण परमहंस तथा जगन्माता महाकाली के सम्मुख निर्द्वन्‍द्व तथा पूर्ण आत्मसमर्पण तक की घटनाआकें पर आधृत है।

'तोड़ो कारा तोड़ो' प्रख्यात कथाओंका आश्रय लेकर लिखे गए उपन्यासों की परंपरा का विकास होते हुए भी,रचना-कर्म की दृष्टि से पर्याप्त भिन्न तथा अभिनव उपन्यास है। पौराणिक गाथाओं पर आधृत उपन्यासों के लेखन में, पौराणिक कथा शैली तथा प्राचीनता के कारण, लेखक की कल्पना तथा सृजन के लिए पर्याप्त अवकाश होता है। उसमें प्राचीन कथा तथा पात्रों पर लेखक का अपना व्यक्तित्व और चिंतन भी मौलिक उद्भावनाओं के रूप में आरोपित हो सकता है।

स्वामी विवेकानन्द का जीवन निकट अतीत की घटना है। उनके जीवन की प्राय: घटनाएं सप्रमाण, इतिहासांकित हैं। यहां उपन्यासकार के लिए अपनी कल्पना अथवा अपने चिंतन को आरोपित करने की सुविधा नहीं है। अपनी बात न कह कर उपन्यासकार को वही कहना होगा, जो स्वामी विवेकानन्द ने कहा था। अपने नायक के व्यक्तित्व और चिंतन से तादात्म्य ही उसके लिए एक मात्र मार्ग है। इस उपन्यास के प्रत्येक पृष्ठ पर उपन्यासकार के अपने नायक के साथ तादात्म्य को देख कर आप चकित रह जाएं गे।

अंग्रेजी तथा बांगला में स्वामी जी की कुछ विस्तृत तथा प्रामाणिक जीवनियां उपलब्ध हैं। ये जीवनियां विभिन्न दृष्टिकोणों से लिखी गई हैं;फिर भी उनमें स्वामी जी के आध्यात्मिक साधक तथा समाजसुधारक होने पर ही सर्वाधिक बल दिया गया है। जीवनीकार तथा उपन्यासकार में अंतर होता है। उपन्यासकार की रुचि कुछ व्यापक होती है। वह अपने नायक तथा उसके संपूर्ण युग को उनकी समग्रता में चित्रित करना चाहता है। अत: साधना को केंन्द्र में मानते हुए भी वह अन्य पक्षों की उपेक्षा नहीं कर सकता। वह जीवनीकार के समान एकांगी नहीं हो सकता।

उपन्यास का शिल्प भी जीवनी के शिल्प से भिन्न है। उपन्यासकार घटनाओं तथा चरित्रों को अलग अलग खानों में रख, उनका एक दूसरे से सर्वथा असंपृक्त विकास नहीं दिखाता। वह अलग अलग स्रोतस्विनियों के असंबद्ध प्रवाह का वर्णन कर ही संतुष्ट नहीं हो सकता ; उसे उन स्रोतस्विनियों के साथ साथ, उन्हें संपृक्त करने वाली भूमि का भी चित्रण करना होगा । नरेन्द्र कोहली ने अपने नायक को उनकी परंपरा तथा परिवेश से पृथक् कर नहीं देखा। स्वामी विवेकानन्द ऐसे नायक हैं भी नहीं, जिन्हें अपने परिवेश से अलग-थलग किया जा सके। वे तो जैसे महासागर के किसी असाधारण ज्वार के उद्दामतम चरम अंश थे। उस ज्वार को पूर्ण रूप से जीवंत करने का औपन्यासिक प्रयत्न है, जो स्वामी विवेकानन्द को पूर्वापर के मध्य रख कर ही देखना चाहता है। अत: इस उपन्यास के लिए न श्रीरामकृष्ण परमहंस पराए हैं; न स्वामी विवेकानन्द के सहयोगी तथा गुरुभाई; और न ही उनकी शिष्य परंपरा की प्रतीक भगिनी निवेदिता।

स्वामी जी का जीवन बंधनों तथा सीमाओं के अतिक्रमण के लिए सार्थक संघर्ष था; बंधन चाहे प्राकृतिक हो,सामाजिक हो,राजनीतिक हो,धार्मिक हो या आध्यात्मिक हो। उन्होंने सारे मानव समाज का उठ खड़े होने मात्र का नहीं,बंधनों को तोड़ने का आवाहन किया था। 'तोड़ो कारा तोड़ो' के आगामी खंड उस अभूतपूर्व अनुपमेय ज्वार को उसकी पूर्णता में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करेंगे।

पृष्ठ : 492, मूल्य : तीन सौ रुपए मात्र।

54. जहां है धर्म,वहीं है जय (महाभारत का विवेचनात्मक अध्ययन)-1993 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली- 110002

महाभारत के कथानक को उसकी अर्थप्रकृति को समझने का प्रयत्न कहा जा सकता है; तथा एक उपन्यासकार के कथानक-निर्माण के सारे उपकरणों तथा तर्क युक्तियों का मर्म भी। पुस्तक रूप में लंबे आख्यान के माध्यम से लेखक ने व्यास के मन में झांकने का प्रयास किया है।

महाभारत को पढ़ने से पूर्व भी लेखक का उससे परिचय था, प्राय: सभी का होता है। कुछ श्रुति परंपरा से, कुछ महाभारतकथा पर आधृत साहित्यिक कृतियों के माध्यम से और कुछ सामाजिक मान्यताओं के माध्यम से । कितनी ही घटनाएं अच्छी लगती हैं,कितने ही पात्र,कितनी ही उक्तियां और कितनी ही धारणाएं मुग्धकारी होती हैं... लेकिन शिकायतें भी कम नहीं होतीं। जब मनुष्य अपने ज्ञान, चिंतन और सिद्धांत को समयसिद्ध चरित्रों और घटनाओं पर आरोपित करता है, तो वह स्वयं को अपने मन में उनसे कुछ बड़ा समझने लगता है। न तो वह तटस्थ भाव से उन चरित्रों और घटनाओं को उनके अपने रूप में जानने का प्रयत्न करता है और न उन ग्रंथों से अपना संभावित विकास कर पाता है। यह तभी संभव हो पाता है, जब उन पात्रों को उन्हीं के देशकाल और मनोविज्ञान में रख कर उनसे परिचय प्राप्त किया जाए।

लेखक के अनुसार - जब उसने महाभारत को साहित्यिक कृति के रूप में पढ़ना आरंभ किया था, तो उसके मन में भी अनेक प्रश्न थे। किंतु पढ़ते-पढ़ते जब महाभारत उसपर आच्छादित होने लगा तो उसने अनुभव किया कि यदि वह स्वयं को महाभारत पर आरोपित करने का प्रयत्न करता है तो महाभारत मौन है और यदि जिज्ञासु बन कर उसके सम्मुख जाता है तो वह उसकी समस्याओं का समाधान करता है।

पृष्ठ : 224, मूल्य : एक सौ पच्चीस रुपए मात्र।

55. महासमर - 4 (धर्म) - उपन्यास - 1993 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002

महासमर का चौथा भाग। इस खंड की कथा, पांडवों को राज्य के रूप में मिले, खांडवप्रस्थ से आरंभ होती हुई, अर्जुन के बारह वर्षों के ब्रह्मचर्यपूर्ण वनवास, खांडवदाह,राजसूय यज्ञ,जरासंध वध, इत्यादि पड़ावों से होती हुई द्यूतसभा तक पहुंचती है।

ईशान महेश ने लिखा है : '' 'धर्म' की कथा में डॉ. नरेन्द्र कोहली ने जहां अपनी कथानक निर्माण की प्रतिभा से पाठक को मंत्रमुग्ध किया है, वहीं तर्कों से उसकी बुद्धि को चमत्कृत भी किया है। निस्संदेह महाभारत की कालजयी कथा पर आधृत यह कृति कालजयी तो है ही, एक मौलिक तथा युगानुकूल कृति भी है,जिससे आजके शंकालु, बुद्धिनिष्ठ पाठक का सहज ही तादात्म्य हो जाता है।''

पृष्ठ : 415, मूल्य : तीन सौ रुपए मात्र।

56. 'तोड़ो कारा तोड़ो' - 2 (साधना) - उपन्यास - 1993 .

प्रकाशक : किताबघर, नई दिल्ली - 110002

'तोड़ो कारा तोड़ो' का दूसरा खंड। इसमें स्वामी विवेकानन्द तथा उनके गुरुभाइयों द्वारा अपने गुरु की सेवा, उनके द्वारा एक भुतहे मकान में मठ की स्थापना और उनकी कठोर तपस्या की कथा है। स्वामी विवेकानन्द अपने गुरु के देहत्याग के पश्चात् अपने गुरुभाइयों को उनके घरों से खींच लाते हैं और उन्हें मठ में बसा कर स्वयं एक अज्ञात संन्यासी के रूप में भारत भ्रमण के लिए निकल जाते हैं।

पृष्ठ : 492, मूल्य : तीन सौ रुपए मात्र।

57. महासमर - 5 (अंतराल) - उपन्यास - 1995 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002

इस खंड में द्यूत में हारने के पश्चात् पांडवों के वनवास की कथा है। कुंती पांडु के साथ शतशृंग पर वनवास करने गई थीं। लाक्षागृह के जलने पर वे अपने पुत्रों के साथ हिडिंब वन में भी रही थीं। महाभारत की कथा के अंतिम चरण में उन्‍होंने धृतराष्ट्र, गांधारी तथा विदुर के साथ भी वनवास किया था; किंतु अपने पुत्रों के विकट कष्ट के इन दिनों में वे उनके साथ वन में नहीं गईं। वे न द्वारका गईं,न भोजपुर। वे हस्तिनापुर में विदुर के घर रहीं। क्यों ?

पांडवों की पत्नियां - देविका,बलंधरा,सुभद्रा,करेणुमती और विजया - अपने अपने बच्चों के साथ अपने-अपने मायके चली गईं; किंतु द्रौपदी कांपिल्य नहीं गई। वह पांडवों के साथ वन में ही रही। क्यों ?

कृष्ण चाहते थे कि यादवों के बाहुबल द्वारा दुर्योधन से पांडवों का राज्य छीन कर पांडवों को लौटा दें। किंतु वे ऐसा नहीं कर सके। क्यों ? सहसा ऐसा क्या हो गया कि बलराम के लिए धार्तराष्ट्र तथा पांडव एक समान प्रिय हो उठे और दुर्योधन को यह अधिकार मिल गया कि वह कृष्ण से सैनिक सहायता मांग सके और कृष्ण उसे यह भी न कह सकें कि वे उसकी सहायता नहीं करेंगे।

इतने शक्तिशाली सहायक होते हुए भी युधिष्ठिर भयभीत क्यों थे ? उन्‍होंने अर्जुन को किन अपेक्षाओं के साथ दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए भेजा था। अर्जुन क्या सचमुच स्वर्ग गए थे, जहां इस देह के साथ कोई नहीं जा सकता ? क्या उन्हें साक्षात् महादेव के दर्शन हुए थे ? अपनी पिछली यात्रा में तीन-तीन विवाह करने वाले अर्जुन के साथ ऐसा क्या घटित हो गया कि उसने उर्वशी के काम-निवेदन का तिरस्कार कर दिया ?

इस प्रकार के अनेक प्रश्नों के उत्‍तर निर्दोष तर्कों के आधार पर 'अंतराल' में प्रस्तुत किए गए हैं। यादवों की राजनीति,पांडवों का धर्म के प्रति आग्रह तथा दुर्योधन की मदांधता संबंधी यह रचना पाठक के सम्मुख इस प्रख्यात कथा के अनेक नवीन आयाम उद्घाटित करती है। कथानक का ऐसा निर्माण,चरित्रों की ऐसी पहचान तथा भाषा का ऐसा प्रवाह - नरेन्द्र कोहली की लेखनी से ही संभव है।

पृष्ठ : 368, मूल्य : दो सौ पच्चीस रुपए मात्र।

58. क्षमा करना जीजी ! - उपन्यास - 1995 .

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली- 110003

यद्यपि यह उपन्यास एक परिवार के संबंधों के भावुक वातावरण को लेकर रचा गया है ; किंतु इस की मूल व्यथा, पारिवारिक संबंधों तक ही सीमित नहीं है। लेखक ने पूर्व स्मृति के शिल्प में प्राय: वे सारे प्रसंग उठाए हैं जो निम्न मध्यवर्ग की नारी के जीवन में, विकास-पथ के विघ्नों के रूप में उसके सामने आते हैं। परिवारजनों का स्नेह, बंधन भी हो सकता है, बाधा भी और अंतत: छोटे-छोटे स्वार्थों तथा असमर्थताओं के कारण वह स्नेह का पाखंड भी हो सकता है।

इस उपन्यास की नायिका जिजीविषा से भरी एक जुझारू महिला है,जो अपने सामर्थ्य,श्रम तथा साहस के बल पर विकास-पथ का निर्माण करना चाहती है। वह अपना विकास कर पाती है या नहीं,इसमें मतभेद हो सकता है,किंतु वह अपने सम्मान की रक्षा में सफल होती है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

पृष्ठ : 110, मूल्य : पचहत्‍तर रुपए मात्र। अजिल्द संस्करण : पैंतीस रुपए मात्र।

59. अभी तुम बच्चे हो - बाल कथा - 1995 .

प्रकाशक : अभिरुचि प्रकाशन, दिल्ली - 110032

एक रोचक बालकथा, जिसमें बच्चों को बाल्यावस्था अपनी स्वतंत्रता के मार्ग में बाधा बनी खड़ी दिखाई देती है। सुंदर, सचित्र प्रकाशन।

पृष्ठ : 40, मूल्य : बीस रुपए मात्र।

60. प्रतिनाद (पत्र-संकलन) - 1996 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002

विधा की दृष्टि से पत्र-साहित्य एक प्रकार से विविधा है। पत्रों में संस्मरण भी हो सकते हैं,रेखाचित्र भी, समीक्षाएं भी, हास्य-व्यंग्य भी और अपवाद स्वरूप कुछ पत्रों में कहानियां भी। लिखने वाला तो अपने किसी मित्र,परिचित अथवा किसी संबंधी को एक आत्मीय पत्र ही लिख रहा है; किंतु अनेक बार वह स्वयं भी नहीं जानता कि वह पत्र कौन सा रूप ग्रहण करेगा। पत्र औपचारिक भी होते हैं और अनौपचारिक भी ; किंतु संबोधित व्यक्ति के विषय में बहुत कुछ बताने के साथ साथ वे लिखने वाले के विषय में भी बहुत कुछ कह जाते हैं। अनौपचारिक पत्र तो एक प्रकार से पत्र लेखक का अपने विषय में दिया गया वक्तव्य ही होता है।

लेखक अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में एक नाद उत्पन्न करता है, जिस का प्रतिनाद भी होता है, जो पुन: लेखक तक पहुंचता है। इस पुस्तक में नरेन्द्र कोहली को लिखे गए, उनके समसामयिक वरिष्ठ साहित्यकारों, संपादकों तथा पाठकों के कुछ चुने हुए पत्र संकलित हैं। लेखक ने प्रवर साहित्यकारों के पत्रों को वरदान, संपादकों के पत्रों को फरमान तथा पाठकों के पत्रों को सम्मान शीर्षक दिया है। साहित्यकार के सृजन- संसार का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज।

पृष्ठ : 140, मूल्य : एक सौ रुपए मात्र।

61.आत्मा की पवित्रता (व्यंग्य) - 1996 .

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली - 110003

''अनुचित, अन्यायपूर्ण अथवा गलत होते देख कर जो आक्रोश जागता है, वह अपनी असहायता में वक्र होकर, जब अपनी तथा दूसरों की पीड़ा पर हंसने लगता है, तो वह विकट व्यंग्य होता है। वह पाठक के मन को चुभलाता सहलाता नहीं, कोड़े लगाता है।'' (बकलम खुद - नरेन्द्र कोहली) आत्मा की पवित्रता में संगृहीत व्यंग्य रचनाएं, इस दृष्टि से सर्वथा खरी हैं।

पृष्ठ : 88, मूल्य : साठ रुपए मात्र।

62. किसे जगाऊं ? (सांस्कृतिक निबंध) 1996 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली- 110002

नरेन्द्र कोहली के सांस्कृतिक निबंधों का यह पहला संग्रह है, और आप यह पढ़ कर ही जान सकते हैं कि एक सर्जक साहित्यकार जब जीवन की गहन दार्शनिक तथा सांस्कृतिक समस्याओं पर विचार करता है तो किस प्रकार उन सूक्ष्म विचारों को भी आकार और शरीर दे कर उन्हें प्राणवान बना, सामान्य जन के जीवन के दैनन्दिन क्रम के समान ही सहज बना देता है। वह उन सारे विचारों को किसी ग्रंथ से नहीं, जीवन से उठाता है। वह विचारों से जीवन की ओर नहीं, जीवन से विचारों की ओर जाता है। उसके लिए वे मात्र सूचना के नहीं, संवेदना के विषय हैं। इसीलिए वे समस्याएं, जीवन से संपृक्त अथवा उसके समानांतर न होकर, उसका अंग ही हैं। स्वयं जीवन हैं।

इन निबंधों में विचारों की गंभीरता के बावजूद, कथा साहित्य की सरसता और पठनीयता है। भाषा का लालित्य और बिंबों की सजीवता आपको मुग्ध कर लेगी। आप पाएंगे कि चिंतन जब सृजन के मार्ग से आता है, तो अपरिचित, परिचित हो जाता है, परिचित आत्मीय हो जाता है तथा वह आत्मीयता आपके लिए बोझ अथवा आपके जीवन में अवांछित हस्तक्षेप न होकर, सहज उत्फुल्लता एवं जीवन का रस हो जाती है।

इस संकलन का पहला निबंध 'स्मरणशक्ति का क्षरण' शिकागो में दिए गए स्वामी विवेकानन्द के भाषण के अनुसार हिंदू धर्म के स्वरूप की व्याख्या करता है; किंतु वह एक मौलिक तथा सृजनधर्मा निबंध है। पाठक जान भी नहीं पाता कि कब नरेन्द्र कोहली अपने व्यक्तिगत अनुभवों और विचारों से उसे क्रमश: उन दार्शनिक अवधारणाओं की ओर ले चलते हैं। यह साहित्य, अध्यात्म और दर्शन को एक साथ पढ़ने का आनन्द है।

पृष्ठ : 104, मूल्य : पंचानवे रुपए मात्र।

63. महासमर - 6 (प्रच्छन्न) उपन्यास - 1997 .

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली - 110002 .

महासमर का छठा भाग। पांडवों के वनवास काल में दुर्योधन तथा उसके भाइयों और मित्रों द्वारा की गई घोषयात्रा, दुर्वासा का अपने शिष्यों के साथ पांडवों के आश्रम में पहुंचना, जयद्रथ द्वारा द्रौपदी का हरण, यक्ष प्रश्न, तथा पांडवों का विराटनगर में अज्ञातवास इत्यादि घटनाएं इस खंड में सम्मिलित हैं। अज्ञातवास महाभारत-कथा का एक बहुत आकर्षक स्थल है।

उपन्यास का सौन्दर्य इस दृष्टि से आकृष्ट करता है कि जो कुछ घटित हो रहा है, वह प्रच्छन्न रूप से हो रहा है। वास्तविकता कुछ और है और आवरण किसी और प्रकार का है। घटनास्थल केवल वन ही नहीं है, लेखक ने सारी कथा को हस्तिनापुर, द्वैतवन, काम्यकवन, द्वारका और विराटनगर में बिखेर दिया है। इस प्रकार कथा एकांगी नहीं लगती। वह अपनी समग्रता में पाठक के सम्मुख अनावृत होती है। इस कथाखंड में चामत्कारिक घटनाएं कदाचित् सब से अधिक हैं; किंतु नरेन्द्र कोहली की लेखनी, उन्हें अद्भुत और चामत्कारिक नहीं रहने देती। वे सब हमारे जीवन की सहज घटनाओं के अनुरूप, स्वाभाविक हो जाती हैं।

इस खंड में दो बातें सब से अधिक ध्यान आकृष्ट करती हैं; एक तो राजनीतिज्ञों का अधिक से अधिक अपराधीकरण अथवा अपराधियों का सत्‍ता के केन्द्र में आ जाना, और दूसरा कृष्ण के देवत्व का क्रमश: उद्घाटन। लेखक की आस्था अपनी पूर्ण प्रबलता से अभिव्यक्त हो रही है; किंतु कृष्ण का देवत्व जिस रूप में उद्घाटित होता चलता है, उसका तर्कशीलता और बौद्धिकता से कहीं कोई विरोध नहीं है। इस कला का वास्तविक रूप तो उपन्यास पढ़ने के पश्चात् ही समझ में आ सकता है।

दुर्योधन की गृध्र दृष्टि से पांडव कैसे छिपे रह सके ? अपने अज्ञातवास के लिए, पांडवों ने विराटनगर को ही क्यों चुना ? पांडवों के शत्रुओं में प्रच्छन्न मित्र कहां थे और मित्रों में प्रच्छन्न शत्रु कहां पनप रहे थे ? ऐसे ही अनेक गंभीर एवं रहस्यमय प्रश्नों की कथा, इस खंड में प्रच्छन्न है।

समीक्षकों का कहना है :

1. ''उन्‍होंने कर्ण के संबंध में जो लिखा है, उसपर काफी चर्चा हुई है। मुझे लगता है कि वह विवाद और भी गहराएगा। गहराना चाहिए ... मैं कर्ण के प्रशंसकों में था, लेकिन उनका उपन्यास पढ़ने के बाद मुझे लगा कि कर्ण ने द्रौपदी के साथ जो किया, उसे क्षमा नहीं किया जा सकता। पांडवों से प्रतिशोध लेने के लिए, राजदरबार में, भरे राजदरबार में द्रौपदी को इस प्रकार अपमानित करना, उसके विरुद्ध अपशब्द कहना कोई जरूरी नहीं था। मैंने सावंत जी (शिवाजी सावंत) का उपन्यास पढ़ा है... (उसमें) कर्ण के प्रति गहरी सहानुभूति है। लेकिन कर्ण के चरित्र के कुछ अंश ऐसे हैं, जो सचमुच कालिख बन जाते हैं। मैं चाहूंगा, इसपर और चर्चा हो। आवश्यक नहीं है कि नरेन्द्र जी ने जो कहा है, आप उसे स्वीकार करें; लेकिन उन्‍होंने एक चुनौती दी है और मुझे लगता है कि यह चुनौती एक विचार मंथन को प्रवृत्‍त करेगी।'' - अटलबिहारी वाजपेयी

2. ''नरेन्द्र कोहली में अपने पात्रों की क्षमता और स्वभाव के अनुरूप भाषा और विचार गढ़ने की उल्लेखनीय क्षमता है। कहीं कहीं तो उनकी वाणी आर्ष वाणी जैसी प्रतीत होती है; अनुभव और संवेदना से दीप्त, सटीक और मंत्र के निकट पहुंचती हुई। ऐसा महर्षि व्यास, कृष्ण, भीष्म पितामह, और धर्मराज युधिष्ठिर के प्रसंगों में हुआ है। वस्तुत: वास्तविक जीवन की तरह, उपन्यास के पात्रों की पहचान भी उसकी भाषा से ही होती है। कोहली ने अपने हर पात्र को उसके वर्ग और स्वभाव के अनुरूप भाषा प्रदान कर उसे विश्वसनीय और आकर्षक बना दिया है।'' - डॉ. गोपाल राय

3. ''नरेन्द्र कोहली इतिहास के जड़ दीखने वाले प्रकरणों और पात्रों को सजीवता प्रदान कर उन्हें पाठक की कल्पना में साकार करने में समर्थ हैं। यही तत्व उनके हाथों महाभारत की कथा को उपन्यास का रूप देता है। कथा क्या है ? यह है परिणामयुक्त, कुतूहलप्रद घटनावली। इसमें पात्रों का जीवन्त चरित्र नहीं बन पाता। उपन्यास, दूसरी ओर, पात्रों के व्यक्तित्व और चरित्र विकास पर विशेष बल देता है, और उन्हीं के सूत्रों से बनती बिगड़ती घटनाओं को साधनरूप में पृष्ठभूमि में रख कर शनै: शनै: मंथर गति से सांकेतिक रूप में कथा कहता कम, उसका दृश्यांकन अधिक करता चलता है। घटना उपन्यासकार के लिए एक माध्यम भर है, जिसके चारों ओर पात्रों के ऊहापोह, चिंतन और उनके अनुचिंतनरत स्वरूप का अधिक सार्थक और रोचक जाल बुना रहता है। यही विधि उन्हें व्यक्तित्व और सजीवता प्रदान करती है। और इसी तकनीक से पात्र साक्षात् हमारे जीवन और उसकी समस्याओं के समीप आते हैं।'' - डॉ. शशिभूषण सिंघल

4. ''आज जब संचार माध्यमों के द्वारा विदेशी संस्कृति का निरंतर प्रचार हो रहा है, हमारी अधिकांश युवा पीढ़ी सतही चकाचौंध के कारण दिग्भ्रमित हो रही है, तथा उपभोक्तावादी संस्कृति ने शिक्षा और साहित्य को एक 'वस्तु' बना दिया है, ऐसे में सत्य, धर्म, न्याय, मानवता, सामाजिकता आदि मूल्यों की स्थापना का नरेंद्रकोहलीय स्वर 'एकला चलो रे' के साहस से युक्त लगता है। आज परिवार की इकाई टूट रही है, संबंध चरमरा रहे हैं, और सत्‍ता मात्र अपने स्वार्थ साधने का मंच रह गया है । आज नेताओं के मुख से राष्ट्रहित और समाजहित की बातें मगरमच्छ के आंसुओं को भी लज्जित करती हैं। पूरा माहौल ही भ्रष्ट लगता है। ऐसे में रचनाकार पौराणिक परिवेश की ओर मुड़ता है तो लगता है कि जैसे वह पलायन कर रहा है। इस तरह के लेखन में अप्रासंगिक होने के खतरे बहुत बढ़ जाते हैं। और जब लेखक अधिक प्रासंगिक होने के मोह में वैज्ञानिक दृष्टिकोण देने लगता है तो कथासूत्र छूटने लगते हैं। नरेंद्र कोहली ने महाभारत की कथा को आज से जोड़ने का कोई अलग प्रयास नहीं किया है, परंतु जैसा कि उनका मानना है -- मनुष्य की प्रकृति वही है, केवल काल बदलता है -- इस आधार पर लगता है जैसे उनके सभी पात्र आज की बातें कर रहें हैं। महाभारत तो राजनीतिक उठा पटक का अखाड़ा है, उसमें हमारे देश की वर्तमान राजनीतिक विसंगतियां अपने संपूर्ण रूप में दिखाई देने लगें तो कैसा आश्चर्य ! कीचक-वध के पश्चात् बल्लव अर्थात् भीम से हुई विराट की बातचीत के दो उद्धरण प्रस्तुत हैं :

1.शक्तिशाली और प्रशासन में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को जब उनके अपराधों का दंड नहीं दिया जाता, तो समाज की शुभ तथा कल्याणकारी शक्तियां हतोत्साहित हो जाती हैं।

2. महाराज अपराध का दंड वैसे तो सबको मिलना चाहिए; किंतु समाज के महत्वपूर्ण लोगों को तो उनके अपराधों का दंड तत्काल और कठोरता से मिलना चाहिए।'' - डॉ. प्रेम जनमेजय

पृष्ठ : 618, मूल्य : साढ़े तीन सौ रुपए मात्र।

64. नरेन्द्र कोहली ने कहा (आत्मकथ्य तथा सूक्तियां) -1997 .

प्रकाशक : शुभम् प्रकाशन, दिल्ली - 110032

कहा तो यह सब कुछ नरेन्द्र कोहली ने ही है; किंतु इस प्रकार पुस्तक के रूप में नहीं कहा था। कभी आत्मकथ्य के रूप में कहा, अपने विषय में बात करते हुए; कभी अपनी सृजन प्रक्रिया की गुत्थियां सुलझाने की प्रक्रिया में कहा; और कभी किसी के प्रश्नों और जिज्ञासाओं का उत्‍तर देते हुए कहा। इतना ही नहीं, लेखक की विभिन्न रचनाओं के पात्र जो कुछ कहते हैं, वस्तुत: कहता तो वह भी लेखक ही है। तो यह सब नरेन्द्र कोहली ने कहा। व्यक्ति के विषय में भी कहा और समाज के विषय में भी। वे समाज के मन में पैठे, व्यक्ति के मन में भी और अपने मन में भी। इस पुस्तक ने तो बस एक मंच प्रस्तुत कर दिया है, जहां नरेन्द्र कोहली की उक्तियां मिल बैठी हैं। वक्तव्य एकत्रित हो गए हैं; और अनुभव रेखांकित हो गए हैं। यह मंच इसीलिए बनाया गया, कि उसके सम्मुख बैठा श्रोता अपनी जिज्ञासाओं का समाधान पा सके और अपने प्रश्नों की तृषा को उनके वास्तविक उत्‍तरों से तृप्त कर सके।

लेखक जो कुछ अपने पात्रों के माध्यम से कहता है, जो वह अपनी बातचीत में कहता है, कहता तो अपना अनुभव ही है। तो उसके कहे से समाज और व्यक्ति मन की गुत्थियां तो सुलझाई ही जा सकती हैं, किंतु उससे बड़ी बात है - एक लेखक को जानना, उसके व्यक्तित्व को जानना, उसके मन को जानना, उसके सृजन को जानना, उसकी सृजन प्रक्रिया को जानना, एक सर्जक साहित्यकार के अंतस को जानना, उसकी आत्मा को जानना।

हमारे पास इस प्रकार की पुस्तकें बहुत कम हैं, जिनके माध्यम से उन पुस्तकों के सर्जक के वास्तविक व्यक्तित्व, उसके मन, उसके सृजन-संसार तथा उसके चिंतन को जान सकें, जो हमें बेहद प्रिय है। सामान्य पाठक के लिए लेखक और कलाकार जिज्ञासा की वस्तु ही बना रहता है -