कौन करेगा ?
-नरेन्द्र कोहली
''आर्य धर्माधिकारी ! प्रणाम करता हूं।''
वसुदेव ने दृष्टि उठाकर ही नहीं, कुछ चकित होकर देखा : यहां कारागार में उनको धर्माधिकारी पुकारने वाला कौन हो सकता है। ... यहां तो वे मात्र कंस के भयंकर शत्रु के रूप में ही जाने जाते थे। प्रत्येक दंडधर, आरक्षी और सैनिक जानता था कि वसुदेव का जितना अधिक अपमान वह करेगा, उतना ही कंस उससे प्रसन्न होगा। अपने राजा की दृष्टि में आने के लिए, पदोन्नति पाने के लिए, अपने शत्रु से प्रतिशोध लेने के लिए... कितने ही प्रकार के लाभों के लिए, केवल एक ही काम करना पड़ता था - वसुदेव और देवकी की उपेक्षा, उनका अपमान, उनकी प्रताड़ना ! ... बस कंस को सूचना मिलनी चाहिए कि किसी ने वसुदेव को पीड़ा पहुंचाई है, कंस का मन खिल उठता था। वह तत्काल उस व्यक्ति को किसी न किसी रूप में पुरस्कृत करने का प्रयत्न करता था। पुरस्कृत न भी करता तो उसके प्रति अपनी प्रसन्नता तो जता ही देता था।...और यहां एक व्यक्ति उसी कंस के कारागार में आकर वसुदेव को आर्य धर्माधिकारी कह कर संबोधित ही नहीं कर रहा, उन्हें प्रणाम भी कर रहा है। कहीं यह कोई धोखा तो नहीं, कोई भ्रम ? कोई मायाजाल ?? कोई षड्यंत्र ???...
''कौन हो भाई ?'' वसुदेव के उठ खड़े होने में बेड़ियां बाधक हो रही थीं।
''मैं मथुरावासी आर्य चतुर्भुज का पुत्र चक्रधारी हूं।'' वह बोला, ''मथुराधिपति महाराज कंस की सेना में सेवा करने को बाध्य हूं।''
वसुदेव के मन में कहीं कोई एक पुराना सा चित्र उभरा ... हां ! चतुर्भुज से कभी उनका व्यवहार रहा था। भलामानुस था।
''कैसे हैं तुम्हारे पिता ?''
''वे तो दिवंगत हो गए।''
''ओह ! मुझे ज्ञात नहीं था।''
''आप अपने संकटों के भंवर में ऐसे फंसे हुए हैं। आपको ये सारी सूचनाएं कहां मिलती होंगी।'' वह बोला, ''और आर्य ! जब उनका देहांत हुआ, आप इस कारागार में थे। यहां बाहर का कोई समाचार पहुंचता ही कहां है।''
''ठीक कह रहे हो भाई !'' वसुदेव उठकर धीरे-धीरे जंगले तक आ गए थे, ''तुम कह रहे हो कि तुम बाध्य होकर चाकरी कर रहे हो ?''
''हां आर्य !''
''बाध्य क्यों हो ?''
''जब चाकरी आरंभ की थी तो गौरव के भाव से की थी। अपनी आजीविका के लिए कुछ तो करना ही था। सोचा, क्यों न कोई ऐसा कार्य किया जाए, जिससे अपने पूर्वजों का नाम भी गौरवान्वित हो। अत: अपने प्राणों पर संकट झेल कर भी, अपने देश और समाज की, दुष्टों से रक्षा करने के लिए, यह क्षत्रिय कर्म स्वीकार किया।''
''यह सब तो तुमने स्वेच्छा से किया।'' वसुदेव बोले, ''तो फिर तुम बाध्य क्यों हो ?''
''तब क्या जानता था कि हमारे धर्माधिकारी को बंदी कर कारागार में डाल दिया जाएगा; और मेरा दायित्व यह देखना होगा कि वे कारागार से कहीं भाग न जाएं।'' चक्रधारी ने कहा, ''स्थितियां तनिक भी मेरे अनुकूल होतीं, तो मैं आपके ये लोहे के सीखचे अभी खोल देता।''
''और ये हमारे नवीन आभूषण - हथकड़ी बेड़ियां ?''
''ओह तात !'' उसकी हथेलियों ने वसुदेव की हथकड़ी का स्पर्श किया। वसुदेव ने देखा, उसकी आंखों में अश्रु आ गए थे।
''दुखी मत होओ मित्र !'' वसुदेव ने हंस कर कहा, ''तुम्हारे किसी संगी-साथी ने देख-सुन लिया तो सूचना ऊपर तक पहुंच जाएगी। मेरा तो कंस कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा, तुम पर ही गाज गिरेगी।''
''नहीं ! आज ऐसा कुछ नहीं होगा।'' उसने हंसने का प्रयत्न किया, ''आज पूरा का पूरा गुल्म हम माथुर सैनिकों का ही है। हमारा नायक भी मथुरावासी ही है।''
''कहां हैं वे सब ?''
''बाहर हैं द्वार पर।'' वह बोला, ''आपके सामने आने में संकोच है उनको। आपको इस प्रकार शलाकाओं के पीछे बंद वे देखना नहीं चाहते; और वे आपको इनसे मुक्त नहीं कर सकते। आपके सामने आकर आपको प्रणाम न करें, यह हो नहीं सकता; और कंस के भय से वे आपको प्रणाम कर नहीं सकते।''
''तो आज एक भी मागध सैनिक नहीं है ?''
''नहीं आर्य !''
''यह कैसे हो गया ?''
''आज महाराज के प्रासाद के प्रांगण में मुष्टिक और चाणूर का नागरिक अभिनन्दन है।'' चक्रधारी बोला, ''सारे मागध सैनिक वहां उपस्थित रहेंगे।''
''वे दुष्ट ...?''
''दुष्ट ही नहीं तात ! वे राक्षस हैं।'' चक्रधारी हंसा, ''महाराज के मित्र हैं। मल्ल कहलाते हैं। असहाय और निरीह लोगों को सताना उनका व्यसन है। कोई सुन्दर स्त्री या बाला उनके दृष्टिक्षेत्र में आ जाए, तो उसका अपहरण और बलात्कार अवश्यम्भावी हो जाता है।'' वह बोला, ''न कोई परिवाद कर सकता है; और न कोई प्रतिकार हो सकता है। स्त्री-आखेट आजकल मथुरा में सर्वाधिक लोकप्रिय क्रीड़ा है।''
''किंतु उनका नागरिक अभिनन्दन ...।'' वसुदेव समझ नहीं पा रहे थे, ''ऐसे लोगों का नागरिक अभिनन्दन ...।''
''न नगर कर रहा है, न नागरिक। कर तो प्रशासन ही रहा है, महाराज के आदेश से। आजकल ऐसा ही होता है आर्य धर्माधिकारी !'' चक्रधारी का स्वर अवसाद में डूब गया, ''महाराज उग्रसेन और धर्माधिकारी वसुदेव जैसे सात्विक पुरुष कारागार में बंद होते हैं; और मुष्टिक और चाणूर जैसे राक्षसों का अभिनन्दन होता है। मेरी समझ में तो प्रभु की यह लीला आती नहीं।''
''प्रभु की लीला सहज ही कहां समझ में आती है।'' वसुदेव मुस्कराए।
''आपने गर्गाचार्य के विषय में वह समाचार सुना या नहीं ?'' सहसा उसने विषय बदल दिया।
''कौन सा समाचार ?''
''उनके आश्रम में कुछ मागध सैनिक जा घुसे थे। सुरा में धुत्त थे। पता नहीं संयोग से जा घुसे थे, या सुरा उन्हें धकेल ले गई थी; या किसी योजना के अधीन सायास भेजे गए थे।'' चक्रधारी बोला, ''उन्होंने आचार्य को अपमानित करने का प्रयत्न किया। आश्रम में भारी उत्पात् किया। वह तो आस-पास के ग्रामों से बहुत सारे लोग एकत्रित हो गए, अन्यथा वे लोग आचार्य को बंदी कर मथुरा ले जाना चाहते थे।''
''किस आरोप में ?''
''आरोप का क्या है, कोई आरोप लगा दीजिए। प्रशासन कुछ भी कर सकता है।'' वह बोला, ''कह दिया कि मथुरा में हुई एक हत्या का षड्यंत्र उनके आश्रम में रचा गया था।''
''कोई प्रमाण ?''
''प्रमाण !'' वह हंसा, ''कह दिया कि प्रमाण न्यायाधिकरण में प्रस्तुत किया जाएगा।''
''इस सीमा तक।'' वसुदेव चकित थे।
''किसी वेश्या अथवा किसी अत्यंत असहाय स्त्री को लाकर खड़ा कर देंगे। वह कह देगी कि गर्गाचार्य ने उसका शीलहरण किया है। बलात्कार भी कह सकती है।... ये दुष्ट क्या नहीं कर सकते।''
''तो आचार्य कहां हैं ? किस स्थिति में हैं ?'' वसुदेव ने पूछा।
''वे अपना आश्रम त्याग, अन्यत्र कहीं चले गए हैं।'' वह बोला, ''जाने कहां गए हैं। उनके शुभचिंतक उन्हें वहां से निकाल ले गए हैं। अच्छा है कि कहीं अज्ञातवास कर लें। इस दुष्ट के राज्य में कौन सा सुख है।''
''तो अब उस आश्रम में कौन है ?''
''अब कोई नहीं है। आचार्य के चले जाने पर अन्य कुछ आचार्यों और ब्रह्मचारियों ने प्रयत्न किया था कि वे लोग गर्गाचार्य की अनुपस्थिति में भी जैसे-तैसे आश्रम को चलाए रखें। किंतु वह संभव नहीं हुआ।''
''क्यों ?''
''शासकीय आदेश आ गया कि वहां बटुकों को उपनिषदों के स्थान पर कंस, जरासंध, कालयवन, भौमासुर, बाणासुर, प्रलंबासुर तथा प्रद्योत इत्यादि की जीवनियां पढ़ाई जाएं। उन्हें महान् आत्माओं के रूप में चित्रित किया जाए।'' वह बोला, ''त्याग के स्थान पर भोग सिखाया जाए; और ब्रह्मचिंतन के स्थान पर कामशास्त्र का अध्ययन कराया जाए।''
वसुदेव ने अपनी हथेलियों से अपने कान बंद कर लिए।
''आप सौभाग्यशाली हैं आर्य ! कि अपने कान तो बंद कर सकते हैं।'' वह बोला, ''मैं जब अपने पुत्र को राजकीय पाठशाला से पढ़ कर आया गया पाठ कंठस्थ करते सुनता हूं, तो अपने हाथों से कान बंद करने के स्थान पर अपनी छाती पीटता हूं।''
''कैसा पाठ ?''
''यही कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है।'' वह बोला, ''स्त्री और पुरुष के देह-मिलन से ही संतान उत्पन्न होती है। उससे परे न कोई शक्ति है और न किसी शक्ति का हस्तक्षेप है। हमारे पास यह एक ही जीवन है, जो इसलिए है कि हम अपनी इंद्रियों से संसार के सुख का भोग कर सकें। बुद्धिमान वही है, जो इस जीवन के क्षण-क्षण का भोग करता है; और आर्ष ग्रंथों को पढ़ कर न अपना समय नष्ट करता है, न अपना जीवन निष्फल व्यतीत करता है।...''
''हे भगवान् !''
''उन्हें बताया जाता है कि शरीर की पवित्रता का कोई अर्थ नहीं है।'' चक्रधारी जैसे आज सब कुछ उगल देना चाहता था, ''लंपटता और व्यभिचार ही जीवन का सत्य हैं। विवाहेतर संबंधों में स्त्री को जो सुख मिलता है, वह अपने पति से कभी मिल ही नहीं सकता।''
''और लोग यह सब पढ़ रहे हैं, इसका विरोध नहीं करते ?''
''बालकों को क्या पता कि सत्य क्या है। वे तो उसी को सत्य मानते हैं, जो कुछ उन्हें पढ़ाया जा रहा है।''
''और हमारे ऋषि और आचार्य ?''
''वे पाठशालाओं में पढ़ाने नहीं जाते।'' चक्रधारी बोला, ''और बुद्धिजीवी लोग ही कौन से सच्चरित्र हैं। वे भी अपनी बुद्धि का दुरुपयोग कर, अधिक से अधिक धन और भोग प्राप्त करने में लगे हैं। वे सोचते हैं कि सच्चरित्रता उन्हें क्या देगी। उससे तो अच्छा है कि प्रशासन को प्रसन्न कर कोई वृत्ति प्राप्त की जाए। कोई पुरस्कार प्राप्त किया जाए। कोई लंबा हाथ मारा जाए।...'' वह रुका, ''आज गए होंगे सब वहां मुष्टिक और चाणूर की स्तुति गाने। सस्वर उनका यश गा रहे होंगे। उनकी महानताओं का बखान हो रहा होगा।...''
''कौन है इन सबका सूत्रधार ?'' वसुदेव जैसे अपने आपसे पूछ रहे थे।
''वही। महाराज कंस का मंत्री - अर्जुनसिंह। उसी को सूझता है यह सब। वह कोई साधारण राक्षस है! वह राक्षसों का राक्षस है। न आंखों से कुछ सूझता है, न पैरों से चला जाता है। कुछ खा सकता नहीं। खा ले तो पचा नहीं सकता। आज मरा कि कल मरा। यमदूत उसे घेर कर बैठे हैं। पर वह जाने से पहले संसार की सारी नैतिकता समाप्त कर के ही रहेगा। इस देश की सारी सात्विक परंपराओं को नष्ट करेगा। जाने समाज को मटियामेट कर क्या मिलने वाला है, उस राक्षस को।''
''और अक्रूर, सत्राजित, सत्यक, चंडसेन आदि क्या कर रहे हैं, वहां राजसभा में बैठ कर ?'' वसुदेव आवेश में थे, ''उनका कोई नैतिक दायित्व है या नहीं ?''
''यह तो वे ही जानें आर्य धर्माधिकारी!'' चक्रधारी बोला, ''हम तो प्रतिदिन उन्हें महाराज कंस की हां में हां मिलाकर उनकी जयजयकार करते ही सुनते हैं।''
''वे लोग कंस से भयभीत हैं क्या ?'' वसुदेव ने पूछा, ''उन्हें कंस का विरोध करते हुए तो मैंने भी नहीं देखा, किंतु तब यह सब तो नहीं था। कंस मेरे नवजात पुत्रों की हत्या कर रहा था। उसे मेरे प्रति कंस की व्यक्तिगत शत्रुता मान कर, वे लोग मौन रह सकते थे; किंतु यह तो सारे समाज से द्रोह है। देश और देश की संस्कृति, चिंतन और परंपरा से द्रोह है। अपने पूर्वजों की इस बहुमूल्य थाती का सर्वनाश होते हुए कोई देख कैसे सकता है; और कोई उसको नष्ट कैसे कर सकता है ?''
''मैं भी इसे समझ नहीं पाता आर्य ! वे सब समाज के संभ्रांत और सुविज्ञ लोग हैं, उच्च शिक्षा-प्राप्त और उच्चाधिकारी हैं, जो अपने देश को इस प्रकार नष्ट कर रहे हैं। वे ही लोभी और देशद्रोही हैं। वे ही बिके हुए हैं। साधारण जन तो यह सब देख-देख कर दुखी है। किंतु वह स्वयं को सर्वथा असहाय पाता है।''
''यही अनुचित है। साधारण जन को असहाय नहीं होना चाहिए ...।''
''वह बेचारा तो बिना जाने बूझे, बिना सोचे समझे, स्वयं को असहाय मान कर, उच्च वर्ग का अनुकरण मात्र कर रहा है... वह अपने भ्रम में उसे अपना नेता मानता है ...।''
दूर से कुछ लोगों की पगध्वनि के साथ उनके बोलने-बतियाने का स्वर आ रहा था ...
''चलता हूं आर्य !'' चक्रधारी ने हड़बड़ी में हाथ जोड़े और भाग गया।
वसुदेव वहीं खड़े देखते रहे : कौन लोग आए हैं ? यदि वे मागध आरक्षी ही थे, तो वे अपने दैनिक निरीक्षण पर आए होंगे। और यदि कोई और है ... चक्रधारी आज कितनी सूचनाएं दे गया था। प्रश्नों से उनकी बुद्धि व्यथित हो उठी थी ... लोग अपने ही देश, धर्म और संस्कृति के शत्रु क्यों हो जाते हैं ? यह आत्मघाती प्रवृति क्यों ? केवल लोभ और भय के कारण ? ...जब देश के भीतर ही उसके इतने शत्रु हों तो बाहर से किसी आक्रमण की आवश्यकता ही क्या है ?...हे प्रभु ! यह तेरी कैसी लीला है ?...
पगध्वनियां निकट आ गईं थीं। ... ये आरक्षियों जैसी चाल नहीं थी।...
अब वसुदेव उन्हें देख पा रहे थे। ...
मागध सैनिक कुछ लोगों को घेर कर घसीटते हुए ला रहे थे। बंदियों के हाथ उनकी पीठ की ओर बंधे हुए थे। उनमें से कुछ के माथे पर रक्त की रेखाएं भी थीं, जैसे उन्हें दंड अथवा शूल के घाव लगे हों। घसीटे जाने के कारण धूल-मिट्टी और रक्त मिल कर एक विचित्र सा काला कीच बनाए हुए थे। ...बीच-बीच में कोई सैनिक उनपर अपना कशा भी फटकार देता था।... स्पष्टत: सैनिक उन बंदियों से पर्याप्त रुष्ट थे और उनको कष्ट देने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे।...
और सहसा जैसे उन बंदियों को कोई दौरा पड़ गया...उन्होंने 'ॐ नम: शिवाय' का आवेशपूर्ण जाप करना आरंभ कर दिया। इधर उन्होंने जाप आरंभ किया और उधर सैनिक अपना रहा-सहा धैर्य और विवेक त्याग कर, विक्षिप्त हो उठे। उन्होंने लगातार अपने कोड़े फटकारने आरंभ कर दिए, ''चुप रहो जारज संतानो ! मौन हो जाओ। सावधान, यदि कोई स्वर निकला तो।''
वसुदेव समझ नहीं पाए कि सैनिक इस जाप से क्यों उद्विग्न हो रहे हैं। बंदी लोग यदि महादेव शिव के नाम का जाप कर रहे हैं तो उसमें सैनिकों को क्या आपत्ति हो सकती है ?... पर वे किस से पूछते ...
सैनिक उन बंदियों को लेकर आगे बढ़ गए। कदाचित् वे उन्हें कारागार के अंत में बनी संकरी और कष्टदायक कोठरियों में पशुओं के समान ठूसने जा रहे थे।
वसुदेव ने देखा, चक्रधारी फिर से लौट आया था।
''देखा आपने ?''
''पर कुछ समझ में नहीं आया।''
''कुछ दिन पहले नगर के प्रमुख शिवालय पर प्रशासन ने यह कह कर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया कि मंदिर के प्रबंधक, मंदिर की आय में से राजा का कर नहीं चुका रहे...।''
''राजा का कर ?'' वसुदेव चकित थे, ''राजा मंदिर को अनुदान देता है, या उससे कर लेता है।''
''लोग कर का विरोध कर रहे थे कि महाराज ने घोषणा की कि शिवाला तोड़ कर वहां एक हाट बनाया जाएगा। उससे प्रजा को क्रय की सुविधा होगी, व्यापारियों को व्यवसाय का अवसर उपलब्ध होगा; और राजा को कर मिलेगा।''
''राजा ने अपने कर के लिए महादेव का मंदिर तोड़ दिया ?'' वसुदेव की आंखें फटी की फटी रह गईं।
''मंदिर तो तोड़ ही दिया। विरोध करने वालों को बंदीगृह में डाल दिया; और अब 'ॐ नम: शिवाय' का जाप भी अपराध घोषित हो गया है।'' चक्रधारी बोला, ''वे आ रहे हैं शायद।''
अगले ही क्षण वह वहां नहीं था।
वसुदेव ठगे से खड़े रह गए।
उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है ... कालयवन अपनी अनास्था के कारण शिवालय तोड़ता। मथुरावासियों को अपना शत्रु मान कर उनके बलभंजन के लिए, उनको अपमानित करने के लिए, उनका आत्मबल तोड़ने के लिए, उनके देवस्थानों को ध्वस्त करता; तो वे उसका कारण और लक्ष्य समझ सकते थे। ... किंतु कंस तो स्वयं मथुरावासी है, माहेश्वर है। वह महादेव के मंदिर का अपमान क्यों कर रहा है ? कालयवन को प्रसन्न करने के लिए ? ...किंतु अपनी प्रजा को प्रताड़ित कर, कालयवन को प्रसन्न कर उसे क्या मिलेगा ?... राजा प्रजा के मन पर राज्य न करे, तो उनकी भूमि पर भी राज्य नहीं कर पाता।
सब लोग चले गए और वसुदेव उन सीखचों को पकड़े वहीं खड़े रह गए।
''क्या सोच रहे हैं।'' देवकी ने उनके कंधे पर हाथ रखा, ''वे सब लोग तो चले गए।''
''हां! चले गए।'' वसुदेव बोले, ''मैं सोच रहा हूं कि इस पृथ्वी पर सात्विकता का कोई भी अंश बच पाएगा क्या ? हमारी परंपरा में जो कुछ श्रेष्ठ है, वह सब नष्ट हो जाएगा क्या ? चारों ओर शत्रु ही शत्रु हैं; और धर्म के पक्ष में लड़ने वाला कोई नहीं है।... दसों दिशाओं में विरोधी शक्तियां सिर उठा रही हैं। ... सिर उठा चुकी हैं। इस देश, इस संस्कृति, इस धर्म का कुछ शेष भी बचेगा क्या; अथवा सब कुछ नष्ट हो जाएगा ?''
''आप कर भी क्या सकते हैं।'' देवकी ने सांत्वना दी, ''आप तो कारागार में बंदी हैं।''
''तो फिर कौन करेगा ? कौन करेगा ?'' उन्होंने देवकी की ओर देखा। उनकी आंखों में चुनौती और वाणी में आवेश था, ''यही पूछ रहा हूं मैं उससे - मैं करूंगा ? वह मुझसे करवाएगा ?? अथवा वह स्वयं करेगा ???''
(शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास 'वसुदेव' का एक अंश)
- नरेन्द्र कोहली , 175 वैशाली, पीतमपुरा, दिल्ली-110088